समान नागरिक संहिता का मुद्दा

समान नागरिक संहिता का मुद्दा हालिया में काफी चर्चा में रहा है| विश्व के अधिकांश विकसित देशों में समान नागरिक संहिता का पालन किया जाता है| हम इस पोस्ट में इसी के बारे में चर्चा करेंगे| हम यहाँ विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे की यूनिफार्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता क्या है? इसके लागू न हो पाने के पीछे क्या कारण है? इसके लागू किये जाने से समाज में क्या सकारात्मक परिवर्तन आ सकते है| आइये चर्चा की शुरुआत करते है.. यूनिफार्म सिविल कोड इन हिंदी
.समान नागरिक संहिता

यूनिफार्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता क्या है


समान नागरिक संहिता से तात्पर्य है कि एक समान कानूनी प्रावधान का सभी नागरिकों पर समान रुप से लागू होना| समान नागरिक संहिता से तात्पर्य है की सभी नागरिक को वास्तविक तौर पर एक माना जाए. अर्थात एक समान कानून सभी नागरिको पर लागू किये जाये| अब प्रश्न उठता है की इसमें नयी बात क्या है? क्योंकि अगर भारतीय संदर्भ में बात करे तो भारतीय संविधान में यह स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है कानून के सामने सभी नागरिक समान होंगे|

हां यह बात तो सही है की भारतीय संविधान में इस तरह के प्रावधान मिलते है लेकिन इसके कुछ अपवाद भी है| दरअसल कुछ धार्मिक, भाषाई आदि रूप से अल्पसंख्यक समुदाय को कुछ विशेष तरह की छुट दी गई थी-इसके तहत माना गया की वह सभी के लिए लागू कानून से अलग आचरण कर सकते है| इस तरह के छुट प्रदान करने के पीछे कुछ पवित्र मानसिकता थी|

यह पवित्र मानसिकता यह थी की अल्पसंख्यक लोगों के मन में कानून के प्रति कुंठा और अविश्वास उत्पन्न न हो| उस समय यह भी विचार किया गया था की जैसे-जैसे उनका आत्मिक, बौद्धिक और भौतिक विकास होगा वे स्वाभाविक रूप से समान कानून को अपना लेंगे| इसी विचार के तहत उन पर समान नागरिक संहिता को बलपूर्वक नही थोपा गया और वह इसे खुद से स्वीकार करे, इस बात का प्रतीक्षा किया जाना मुनासिब समझा गया|

परन्तु इतने समय के बाद भी सभी समुदाय द्वारा समान नागरिक संहिता को न अपनाने की मानसिकता ने पूर्व के विचार पर संदेह उत्पन्न किया है| अब यह माना जाने लगा की बलपूर्वक सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए| क्योंकि समान नागरिक संहिता राष्ट्र की विकास की शर्त है|

समान नागरिक संहिता में अपराधिक संहिता नहीं आती| अपराधिक संहिता यह निर्धारित करती हैं कि कौन सा आचरण अपराध की श्रेणी में आता है| भारत के संदर्भ में और गहराई से अवलोकन करें तो भारत में भारतीय दंड संहिता का प्रावधान सभी नागरिकों पर एक समान प्रभावी है| जबकि समान नागरिक संहिता को धर्म के अनुसार आचरण पर छोड़ दिया गया|

इसी  परिप्रेक्ष्य में हिंदू कोड बिल स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संसद पटल पर रखा गया था तथा अधिनियम के रुप में स्थापित हो गया जिससे तलाक, गोद, उत्तराधिकार, विवाह जैसे आचरण पर एक समान नियम लगा दिया गया| बुद्धिजीवियों द्वारा भी हिंदू कोड बिल का विरोध किया, विरोध की वजह यह थी कि वे चाहते थे, ऐसे नियम कानून भारत के सभी नागरिकों पर एक समान रूप से लागू किए जाए जिससे भारत की एकता को बल मिले|

परंतु तत्कालीन भारत विभाजन के विध्वंस के मंजर को अभी तक भूलाया नहीं जा सका था जिससे तत्कालीन मंत्रियों नेताओं बुद्धिजीवियों द्वारा इसका विरोध किया गया|  एक बात तो इससे साफ़ है की तत्कालीन परिस्थितियां इसके लिए उपयुक्त नहीं थी, परंतु आजादी के सात दशक के बाद भी समान नागरिक संहिता का ना होना भारत के सामाजिक सुधार के ओर बढ़ने की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है|

   भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य की मूलभूत सिद्धांत के रूप में समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रावधान करता है| परंतु राज्य के नीति निदेशक तत्व के रूप में अपनी प्रकृति में प्रवर्तनीय नहीं होने के कारण  इसे न्यायालय द्वारा बाध्यकारी रूप से लागू
नहीं कराया जा सकता है |सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी व्यवस्था दी है कि यदि किसी विधि की संवैधानिकता को निर्धारण करते समय न्यायालय यह  पाए कि अमुक विधि निदेशक तत्व को प्रभावी करना चाहती है तो न्यायालय अनुच्छेद 14 या 19 के तहत इस विधि को संवैधानिकता से बचा सकती है|
     हालिया में तीन तलाक का मुद्दा काफी गर्मजोशी के साथ समाज में आया, तीन तलाक की समाप्ति को लेकर समाज में लगभग सहमति भी बनी तथा इसे कानूनी जद में लाने की बात छिड़ी| ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज के 21वीं सदी के भारत में महिलाओं ने बढ़ चढ़कर तीन तलाक खिलाफत की और इसे कानूनी रूप देने की वकालत की| समान नागरिक संहिता के अभाव में सबसे अधिक कोई वर्ग प्रभावित होता है तो वह महिलाएं ही हैं क्योंकि धर्म के आचरण की बात की जाए तो उन्हें दोयम दर्जा प्रदान किया गया है जिससे उनका शोषण मानसिक और शारीरिक दोनों स्तर पर होता है|

     समान नागरिक संहिता का अभाव भारतीय संविधान के उद्देश्य कल्याणकारी राज्य के प्रति सबसे बड़ी बाधा के रूप में खड़ी है| समान नागरिक संहिता लागू न हो पाने के निम्न कारण हो सकते हैं:

  • भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और समान नागरिक
    संहिता धार्मिक स्वतंत्रता में एक हस्तक्षेप है|
  • .भारत में प्रारंभ से ही लोगों का आचरण धर्म आधारित रहा है|
  • समान नागरिक संहिता को बलपूर्वक लागू करना अल्पसंख्यकों के अंदर असुरक्षा की भावना को प्रबल करेगा जिससे उनके आतंकवादी या अन्य उग्रवादी कृत्यों में संलिप्त होने की सम्भावना बढ़ेगी|
  • भारत में इसके लागू होने के पीछे वोट बैंक की राजनीति प्रमुख कारण रही है|
  • भारत में धर्म अत्यंत संवेदनशील तथा अंतःकरण का विषय माना जाता है ऐसे में बलपूर्वक किया जाने वाला ऐसा कार्य सामाजिक अशांति को बढ़ावा देगा|

एक स्तर से देखा जाए तो समान नागरिक संहिता को लागू करने के पश्चात भारतीय समाज में महत्वपूर्ण सकारात्मक परिवर्तन आने की संभावना है, जो इस प्रकार हैं:

  • इससे लोगों के मन में एकता की भावना को प्रगाढ़ता मिलेगी|समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता को नियंत्रित किया जा सकेगा क्योंकि सभी धर्मों पर एक समान कानून लागू किया जाएगा|
  • क्योंकि अभी तक नागरिकों पर एक समान कानून लागू नहीं था तो शासन विरोधी तत्वों को यह दुष्प्रचार करने का मौका मिलता है कि सरकार किसी विशेष संप्रदाय की पक्षधर है|
  • समान नागरिक संहिता से किस प्रकार के शासन विरोधी तत्वों पर अंकुश लग सकेगा|
  • इस प्रकार बहुधर्मी, बहु भाषाएं तथा विभिन्न मतावलंबियों को एक समान उद्देश्य के प्रति प्रेरित किया जा सकेगा जो कि विकास में सहायक होगी|
  • समान नागरिक संहिता के लागू होने से सबसे अधिक लाभान्वित महिलाएं होंगे| इससे महिला सशक्तिकरण को बल मिलेगा तथा उत्तराधिकार, गोद, विवाह, तलाक, संपत्ति आदि विभिन्न विषयों में महिलाऐं संवैधानिक अधिकार प्राप्त करेंगी|
  • संसाधन पर अतिरिक्त दबाव को घटाया जा सकेगा|

समान नागरिक संहिता की अनुपस्थिति भारतीय नागरिकों को समानता, प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता गरिमापूर्ण जीवन की संकल्पना भारत की एकता अखंडता से वंचित रखती है| भारत में धर्मनिरपेक्ष की अवधारणा पश्चिमी अवधारणा से पूर्णता भिन्न है| पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की नकारात्मक अवधारणा अर्थात धर्म में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप ना होना को इंगित करता है जबकि, भारत  में धर्मनिरपेक्षता की  सकारात्मक पहलू को अपनाया गया अर्थात राज्य का कोई धर्म नहीं होगा| परंतु सर्व धर्म समभाव के सिद्धांत को आचरण में लाया जाएगा तथा धर्म के नाम पर होने वाले अमानवीय कृत्य कुरीतियां रूढ़ियां आदि पर अंकुश लगाया जाएगा| इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि  समान नागरिक संहिता का ना होना भारतीय संविधान की मूल आत्मा पर कुठाराघात है| इसे सावधानी पूर्वक जन जागरूकता फैलाते हुए क्रमिक रूप से धर्म एवं संस्कृतियों से यथासंभव तर्क ले कर लागू किये जाने की आवश्यकता है|

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