एक देश एक चुनाव

वर्तमान में एक देश एक चुनाव का मामला काफी बहस का विषय बना हुआ है| परन्तु बहुत से लोग इसके बारे में ज्यादा कुछ नही जानते है| इसीलिए हम इस पोस्ट में आज एक देश एक चुनाव से सम्बन्धित बाते करेंगे| हम यहाँ जानेंगे की एक देश एक चुनाव से क्या मतलब है? यह क्यों बहस का विषय बना है? इसके लागू किये जाने में क्या चुनौती है? आइये चर्चा प्रारम्भ करते है|

एक देश एक चुनाव

एक देश एक चुनाव से मतलब है की पुरे देश में 5 साल में एक ही चुनाव का होना| यानि की केंद्र स्तर और राज्य स्तर पर विधान सभा का चुनाव एक ही साथ हो| नीती आयोग क अनुसार वर्ष 2024 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होना राष्ट्रिय हित में होगा| निति आयोग का यह भी कहना है की इसके लिए एक विशेषज्ञों की टीम गठित की जाइ जो की इससे सम्बन्धित सिफारिश दें|

कानून दिवस की अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह बात दोहराई| अब प्रश्न उठता है की एक देश एक चुनाव की लाभ और सीमाएं तथा चुनातियां क्या है? आइये इस पर विचार करें|

एक देश एक चुनाव की सकारात्मक पह्लुएँ


  • चुनाव के लिए आचार सहिंता लागु होती है| यह आदर्श चुनाव के लिए आवश्यक भी है| परन्तु बार-बार इस आचार सहिंता के कारण सरकारें नये कार्यक्रमों को न तो ला पाती और न ही उनका क्रियान्वयन कर पाती है| जिससे जाहिर तौर पर विकास प्रभावित होता है| एक साथ चुनाव संपन्न हो जाने पर बार बार के अवरोध से निजात मिल सकेगी|
  • भारत दुनिया के बड़े लोकतान्त्रिक देशों में से एक है| ये हमारे लिए एक गर्व का विषय भी रहा है| परन्तु अगर गौर किया जाए तो स्थानीय  स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक चुनाव होने से हर साल चुनाव का सामना करना पड़ता है|
  • एक देश एक चुनाव का सबसे अधिक लाभ संसाधन के सरंक्षण पर पड़ेगा| चाहे हम बात मानव संसाधन की करे या भौतिक संसाधन की सभी स्तर पर हम लाभान्वित होंगे| दुसरे सुरक्षा के स्तर पर भी इसका सकारत्मक प्रभाव होगा|
  • पुरे पांच साल में सिर्फ एक बार चुनाव होने से सरकारी खजाने पर आरोपित अतिरिक्त दबाब बहुत हद तक कम किया जा सकेगा | इसके अलावा चुनावी त्यौहार में सरकारी कर्मचारी की एक बहुत बड़ी संख्या प्रभावित होती है| अर्थात वह चुनाव कार्य में लगा दिए जाते है| एक देश एक चुनाव से उनके कार्यों में बार बार व्यवधान की समस्या उत्पन्न नही होगी और सार्वजानिक कार्यों को गति मिल सकेगी| सबसे ज्यादा संख्या में शिक्षक जो की चुनावी गतिविधियों में लगा दिए जाते है, अपने शिक्षन से सम्बन्धित जिम्मेवारियों को पूरा आकर सकेंगे|
  • देखा जाए तो चुनाव में सुरक्षा का मसला अहम हो जाता है तथा इसके लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की नियुक्ति की जाती है| हाल की घटनाओं में सीमा क्षेत्र संवेदनशील हो गया है तथा आतंकवाद भी मुंह फैलाए खड़ा है|ऐसे में 5 साल में सिर्फ एक बार चुनाव से निपटकर सुरक्षाबलों को सीमा क्षेत्रो एवं आतंक निरोधी गतिविधियों में लगाया जा सकेगा|
  • जैसा की हमने पहले भी चर्चा की है तथा हम महसूस करते है की चुनाव के समय चुनावी त्यौहार सी धमक होती है, आचार संहिता तो लागु होती ही है| इन सबसे सार्वजनिक कार्य के अलावा व्यक्तिगत कार्य भी प्रभावित होते है| पांच साल में सिर्फ एक बार चुनाव के सम्पन्न हो जाने से बार – बार के व्यव्धान से निजात मिल सकेगी|
  • बार बार चुनाव के कारण राष्ट्रीय हित के अजेंडे मुख्य तौर पर प्रभावित होते है| इसके अलावा कहीं न कहीं वोट बैंक की राजनीती शुरू हो जाती है| एक देश एक चुनाव की पद्धति लागु होने से इसे बहुत हद तक कम किया जा सकता है|

एक देश एक चुनाव की सीमाएं तथा चुनौतियां


एक देश एक चुनाव पर नीति आयोग से लेकर भारत के प्रधानमत्री श्री मोदी ने भी समर्थन को लेकर अनेक बार बयान जारी किये है| इसके निश्चित तौर पर कई सकरात्मक पह्लुएँ है फिर भी इसकी कुछ सीमाओं को समझना जरुरी है, इसे नजरंदाज नही किया जा सकता है|
  • भारत के संविधान में संघीय ढांचा को अपनाया गया है तथा इसकी मूल आत्मा के अनुसार विधान सभा का चुनाव स्थानीय मुद्दों के आधार पर लड़ा जाता है, अर्थात राज्य विधानसभा की जनता अपने हितो के अनुसार अपने नेताओ की प्रदर्शन आदि के आधार पर वोट देती है| लेकिन एक साथ चुनाव होने पर इस मूलभावना के लोप होने की जायदा सम्भावना है और यह संघीय ढांचे के अनुरूप नही होगा|
  • भारत के संविधान में ऐसा कोई भी प्रावधान नही है| अतः इस हेतु संविधान संसोधन एक प्रमुख चुनौती है| हालाँकि भारत में वर्ष 1967-1968 तक लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव एक साथ अवश्य होते थे|
  • अभी तक जन प्रतिनिधि जागरूक तौर पर कार्य करते है क्युकी उन्हें लगता है की किसी जगह पर चुनाव जितने के बाद कार्य न करने का खामियाजा उन्हें किसी दुसरे जगहों के चुनाव में उठाना पद सकता है, क्युकी अल्टरनेट रूप से कहीं न कहीं चुनाव होने वाला ही होता था| परन्तु एक देश एक चुनाव के बाद पांच साल तक उन्हें जड़ता के तौर पर होने की सम्भावना है|
  • एक देश एक चुनाव को लेकर राजनितिक दलों में उहा-पोह और संदेह की स्थिति उत्पन्न हो गई है जो काफी अस्थिरता ला सकता है | अनेक राजनितिक दल इसे सत्तारूढ़ दल की चाल बता रही है तथा इसके खिलाफ है| ऐसे चुनौतियों से में इस हेतु समर्थन जुदा पाना काफी मुस्किल जान पड़ता है|
  • अगर बड़े राजनितिक दलों की बात की जाए तो उन्हें एक देश एक चुनाव की बेहतर लाभ प्राप्त हो सकता है| परन्तु छोटे और क्षेत्रीय दलों को इससे निराशा ही लग रही है, उन्हें साथ लेकर आना एक बड़ी चुनौती है|
  • चुनाव आयोग ने भी इस ओर इशारा किया है की एक साथ चुनाव कराणे के लिए अधिक संख्या में EVM और संसाधन की जरूरत होगी|इसे पूरा करना भी एक चुनौती है|

 निष्कर्ष


एक देश एक चुनाव का विचार से राज्यों की राजनितिक स्वायत्तता जाने अनजाने तौर पर प्रभावित होने की सम्भावना है, ऐसे में यदि संविधान संसोधन के माध्यम से इसे अमलीजामा पहनाया जाता है तो इसमें यह सुनिश्चित करना निहायत जरुरी है की इससे संघवाद की मूल भावना सुरक्षित रहें, तथा हमारी विविधता जो हमारी पहचान है, हमारी अमूल्य निधि है वह सुरक्षित बनी रहें| इसके आलावा कुछ अन्य अनुसंशाओ पर विचार करने तथा उन्हें शामिल करने की सम्भावना पर विचार करने की जरूरत है| उदाहरण के लिए-
  • स्थायी समिति की अनुशंसा- चुनाव दो चरणों में आयोजित किये जाने चाहिए| पहले चरण में आधी विधान सभा के लिए लोकसभा के मध्यावधि में और शेष लोकसभा के साथ|
  • विधि आयोग की अनुशंसा- जिस विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के आम चुनावों के 6 माह पश्चात खत्म हो, उन विधान सभा के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ करा दिया जाएँ लेकिन 6 माह पश्चात विधान सभा के कार्यकाल पूरा होने के बाद ही परिणाम जारी किये जाएँगे|

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