उपवास- एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्यात्मिक क्रिया

उपवास हमारी संस्कृति से बहुत मजबूती से अंतर्संबंधित है| इसकी आध्यात्मिक महत्व के साथ ही बहुत बड़े स्तर पर वैज्ञानिक महत्व भी है| लेकिन उपवास के ठीक-ठीक लाभ प्राप्त करने के लिए तथा इसके कुप्रभाव से बचने के लिए  इसकी गूढ़ता की जानकारी आवश्यक है, नहीं तो यहीं उपवास हमारे लिए दुख का कारण साबित हो सकता है| दूसरी ओर यह कहा जा सकता है कि निसंदेह उपवास का विकल्प नहीं है और यह हमारे जीवन के सांसारिक आध्यात्मिक वैज्ञानिक पहलुओं के लिए नितांत आवश्यक है और बेहतर जीवन के लिए सभी को इसे अपनाना चाहिए| हम इस पोस्ट में उपवास के महत्व और उसका पर्व से कैसे संबंध है? उपवास के विभिन्न प्रकार तथा उपवास या फास्टिंग के लिए ध्यान रखने योग्य आवश्यक बातें की चर्चा करेंगे|
उपवास

उपवास का महत्व


इसे पेट में रुका अपच पच जाता है, हमारा पाचन तन्त्र  विश्राम पाकर नई चेतना के साथ दुरुस्तता से कार्य करना आरम्भ करता है| अमाशय में भरे हुए अपक्व अन्न से जो विष उत्पन्न होता, वह नहीं बनता| एक लाभ यह भी हो सकता है की इससे आहार की बचत होगी और इस अर्थ में फास्टिंग एक आर्थिक लाभ वाली क्रिया कही जा सकती है|  इसके महत्व को देशभक्ति, मानवधर्म से जोड़कर भी देखा जा सकता है, क्योंकि हमारे देश सहित दुनिया में घोर गरीबी और संसाधनविहीनता के बीच जहाँ बहुत सारे लोग भूखे रहने पर मजबूर है, वहां एक समय के फास्टिंग से कईयों तक निवाला पहुँच सकता है|
गीता में  भी लिखा है- विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः”  अर्थात उपवास से विषय विकारों की निवृति होती है|
   मन का विषय विकारों से रहित होना एक बहुत बड़ा मानसिक लाभ है| यह आगे बढ़ने और सफल होने का आधार है| हमारे संस्कृति में यही कारण है की प्रत्येक शुभ कार्य के साथ फास्टिंग को जोड़ दिया गया है|
प्राचीन विद्वान् से लेकर आधुनिक विद्वानों ने भी स्वअल्पाहार को दीर्घजीवन का आधार बताया है| प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में समस्त रोगों में पूर्ण या आंशिक उपवास को ही प्रधान उपचार माना गया है|  अन्नमय कोष की शुद्धि के लिए उपवास की विशेष आवश्यकता होती है| शरीर में कई प्रकार की उपत्यकाएं या नदी गुच्छक होते है जिनका हमारे व्यवहार, चिंतन, रोग- निरोगता, प्रसन्नता, सम्पूर्ण बाह्य व्यक्तित्व से आंतरिक व्यक्तित्व तक प्रभावित होता है| उपवास का इन उपत्यकाओं के संसोधन, परिमार्जन और सुसंतुलन से बड़ा गहरा सम्बन्ध है| योग साधना में भी उपवास को विशेष महत्व दिया गया है|

उपवास और विभिन्न पर्व का संबंध

सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन होना, चन्द्रमा का घटना और बढ़ना, नक्षत्रो का भूमि पर आने वाला प्रभाव, सूर्य की किरणों का मार्ग| इन चारो का शरीरगत ऋतू अग्नियों के साथ सम्बन्ध होने से पड़ने वाले परिणाम को देखते हुए विभिन्न पुण्य पर्व निश्चित किये गये है| विशेषकर इसमें उपवास को महत्व दिया गया है जिसे करने से वांछित परिणाम प्राप्त हो सकता है| जैसे तीज, छठ, करवा चौथ, ईद|
  आइये एक प्रसिद्द व्रत करवा चौथ को देखते है की उपर बताये अनुसार इसका कैसे निर्धारण किया गया है|
कार्तिक कृष्ण चौथ को करवा चौथ भी कहा जाता है| उस दिन का उपवास दाम्पत्य प्रेम बढाने वाला होता है, क्योंकि उस दिन की गोलार्ध स्थिति, चंद्रकलाएँ, नक्षत्र प्रभाव एवं सूर्य मार्ग का सम्मिश्रण, परिणाम, शरीरगत अग्नि के साथ समन्वित होकर शरीर एवं मन की स्थिति को ऐसी उपयुक्त बना देती है जो दाम्पत्य सुख को सुदृढ़ और चिरस्थायी बनाने में बड़ा सहायक होता है| इसी प्रकार के अन्य व्रत है जो अनेक इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरा करने में तथा बहुत से अनिष्टों को टालने में उपयोगी सिद्ध होते है|

उपवास के प्रकार


उपवास को पांच प्रकारों में बांटा जा सकता है

  1. पाचक उपवास – यह पेट के अजीर्ण, कोष्ठबद्धता को पचाता हैं| इसमें भोजन को तब तक छोड़ देना चाहिए जब तक कि कड़ाके की भूख न लगे| इसके दौरान नींबू का रस, जल एवं किसी पाचक औषधि का सेवन किया जा सकता है|
  2. शोधक उपवास– यह रोगों को भूखा मार डालने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा शास्त्र में उपयोग किया जाता है| यह लगातार तब तक चलता है जब तक रोगी खतरनाक स्थिति को पार ना कर ले| शोधक के साथ विश्राम भी आवश्यक है| इसमें उबालकर ठंडा किया हुआ पानी लिया जाता है|
  3. शामक उपवास- यह कुविचारों, मानसिक विकारो, दुष्प्रवित्तियो एवं विकृत उपत्यकाओं का शमन करते है| यह दूध, छाछ, फलो का रस आदि पतले, रसीले, हल्के पदार्थो के आधार पर चलते है| इनमें स्वाध्याय, आत्मचिंतन, एकांत सेवन, मौन, जप, ध्यान, पूजा, प्रार्थना आदि आत्मशुद्धि के उपचार भी साथ में चलते रहना चाहिए |
  4. आनक  उपवास- यह किसी विशेष प्रयोजन के लिए दैवीय शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किया जाता है| आनक में सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवीय शक्ति का आवाहन किया जाता है | सूर्य की सात वर्ण  किरणों में सात ग्रहों की शक्ति सम्मिलित होती है: रवि (सूर्य), सोम (चन्द्रमा), मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि| रवि तेजश्विता, उष्णता, पित्त प्रकृति प्रधान है| चन्द्रमा शीतल, शांतिकारक, उज्जवल, कीर्तिकारक है| मंगल कठोर, बलवान,  संहारक है|| बुध सौम्य, शिष्ट, कफ प्रधान, सुन्दर, आकर्षक है| गुरु विद्या, बुद्धि, धन, सूक्ष्मदर्शिता, शासन, न्याय, राज्य का अधिष्ठाता है| शुक्र वात प्रधान, चंचल, उत्पादक, कुटनीतिक है| शनि स्थिरता, स्थूलता, सुखोपभोग, दृढ़ता परिपुष्टि का प्रतीक है| किसी भी व्यक्ति को अपने अंदर जिस गुण की आवश्यकता जान पड़े, उसी अनुरूप  तत्वों को आकर्षित करने के लिए उसी दिन का फ़ास्ट रखना चाहिए| इनमें आहार और वस्त्र जहा तक संभव हो उन ग्रहों से समता रखने वाला होना चाहिए
  5. पावक उपवास- यह पापो के प्रायश्चित के लिए होता है| ऐसे उपवास केवल जल लेकर करने चाहिए| अपनी भूल के लिए प्रभु से सच्चे ह्रदय से क्षमा याचना करते हुए भविष्य में वैसी गलती न करने का प्रण करना चाहिए| अपराध के अनुरूप शारीरिक कष्ट, साध्य, तितिक्षा और शुभ कार्य के लिए इतना दान करना चाहिए जो पाप की व्यथा को पुण्य की शांति के बराबर कर सके |

उपवास या फास्टिंग के लिए ध्यान रखने योग्य आवश्यक बातें

  • फ़ास्ट के दिन जल बार-बार पीना चाहिए| बिना प्यास के भी पानी पीना चाहिए|
  • इस दिन यदि निराहार न रहा जाए तो अल्प मात्र में रसीले पदार्थ दूध, फल आदि लेना चाहिए| मिठाई, हलवा आदि गरिष्ठ भोजन भरपेट खा लेने में फास्टिंग का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता|
  • फ़ास्ट तोड़ने के बाद हल्का शीघ्र पचने वाला आहार अल्पमात्रा में लेना चाहिए| फ़ास्ट समाप्त होते ही अधिक मात्र में भोजन कर लेना हानिकारक है |
  • इस दिन अधिकांश समय आत्मचिंतन, स्वाध्याय या उपासना में लगाना चाहिए |
  • साधक का अन्नमय कोश किस स्थिति में है? कौन सी उपत्यकाएं विकृत हो रही है? किस उत्तेजित संस्थान को शांत  करने और किस मर्मस्थल को सतेज करने की आवश्यकता है? यह देखकर निर्णय किया जाना चाहिए की कौन व्यक्ति किस प्रकार का उपवास करे|

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