महंगाई या मुद्रास्फीति

वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत में लगातार वृद्धि की अवस्था महंगाई या मुद्रास्फीति कहलाती है| इसे अर्थशास्त्र में इन्फ्लेशन भी कहा जाता है| यह स्वाभाविक रूप से बचत पर विपरीत प्रभाव डालती है| हम इस पोस्ट में महंगाई या मुद्रास्फीति के बारे में विभिन्न बातों पर चर्चा करेंगे| हम यह भी देखेंगे की विभिन्न आधार पर महंगाई या मुद्रास्फीति के प्रकार क्या है. आइये चर्चा की शुरुआत करते है|
महंगाई या मुद्रास्फीति
जब अर्थव्यस्था में वस्तुओं का मूल्य अथवा सेवाओं का मूल्य बढ़ जाता है तो इसे महंगाई कहा जाता है. एक स्तर तक  किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति स्वाभाविक है| परन्तु जब यह सामान्य से अधिक रफ्तार में बढ़ने में लगती है तो अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिहाज से खराब होती है|
     महंगाई या मुद्रास्फीति किसी भी देश की मुद्रा के खरीदने की क्षमता में भी कमी उत्पन्न करती है| यही कारण है कि महंगाई के कारण यदि किसी मुद्रा की खरीदने की क्षमता शुन्य हो जाए तो उसे प्रचलन से बाहर कर दिया जाता है|  महंगाई का सर्वाधिक प्रभाव गरीबों पर पड़ता है| यदि  महंगाई अत्यधिक तीव्र गति से बढता है तो ऋण प्राप्त करने वाले को मुनाफा होता है जबकि ऋण देने वाले को घाटा होता है|

महंगाई या मुद्रास्फीति के प्रकार

महंगाई के कारण के आधार पर  महंगाई या मुद्रास्फीति को तीन मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है|
  • मांग प्रेरित  महंगाई (डिमांड फुल इन्फ्लेशन)- यह किसी भी अर्थव्यवस्था में मांग में  वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है| यदि अर्थव्यवस्था में तरलता यानी कि मुद्रा का प्रभाव अधिक हो जाए तो उपभोक्ता ज्यादा से ज्यादा उपभोग करता है, इसके कारण मांग में वृद्धि हो जाती है| यदि इस बढे हुए मांग की सही मात्रा में सही समय पर आपूर्ति ना हो पाए तो कीमतों में वृद्धि दर्ज होती है इसे मांग प्रेरित  महंगाई कहते हैं| विकासशील देशों में जहां मांग लगातार बढ़ रही है वहां  मांग प्रेरित  महंगाई का उत्पन्न होना सामान्य बात है| अतः यह कहा जा सकता है कि आर्थिक समृद्धि मांग प्रेरित महंगाई से संबंधित होता है|
  • लागत प्रेरित महंगाई (कॉस्ट पुश इन्फ्लेशन)- यह किसी भी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की प्रक्रिया में होने वाले व्यय में वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है अर्थात कच्चे पदार्थ की कीमत या किसी भी अन्य लागत में वृद्धि हो जाए तो अंतिम उत्पादित वस्तु की कीमत में वृद्धि स्वतः हो जाएगी| मिसाल के लिए यदि कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हो जाए तो उत्पादन की प्रक्रिया में होने वाला व्यय बढ़ जाएगा एवं अंतिम उत्पादित वस्तु है महंगी हो जाएगी|
  • संरचनात्मक  महंगाई (स्ट्रक्चरल इन्फ्लेशन)- यह किसी भी  अर्थव्यवस्था में भंडारण एवं वितरण के सुविधा में कमी के कारण उत्पन्न होती है| यह जमाखोरी, व्यावसायिक समूहीकरण तथा कालाबाजारी के कारण भी उत्पन्न होती है| यह यातायात की सुविधा में कमी के कारण भी उत्पन्न होती है|
    • जमाखोरी: यदि एक  व्यापारी या  बिचौलिया किसी वस्तु को उत्पादक से अत्यधिक मात्रा में खरीदकर उसे बाजार तक न पहुंचने दे  एवं लंबे समय तक उस वस्तु को अपनी गोदाम में रख लें जिससे बाजार में उस वस्तु की  कृत्रिम कमी उत्पन्न हो तब यह जमाखोरी कहलाती है|
    • व्यावसायिक समूहीकरण: किसी भी अर्थव्यवस्था में  वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य मांग एवं आपूर्ति तथा प्रतिस्पर्धा पर आधारित होती है| यदि इन वस्तुओं के उत्पादन अथवा सेवा प्रदान करने वाली कंपनियां प्रतिस्पर्धा को दरकिनार कर आपसी सहमति से मूल्यों में बढ़ोतरी कर दे तब यह व्यवसायिक समूहीकरण कहलाता है|
    • कालाबाजारी: यदि एक अनिवार्य वस्तु जिसे सरकार सस्ते मूल्य पर उपभोक्ता को उपलब्ध कराने का प्रयास करती है, परंतु विक्रेता उस वस्तु को उपभोक्ता को सस्ते मूल्य पर न देकर  खुले बाजार में उच्च मूल्य पर बेच दे तब यह कालाबाजारी कहलाती है|
भारत में  महंगाई के पीछे  मांग प्रेरित, लागत प्रेरित, संरचनात्मक तीनों ही कारण हैमहंगाई का नियंत्रण भारतीय केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एवं भारत सरकार संयुक्त रुप से एक दूसरे के सहयोग से ही कर सकती है| यदि अपनी मौद्रिक एवं साख नीतियों के माध्यम से महंगाई को कम करने का प्रयास करें लेकिन सरकार अपने खर्च पर नियंत्रण न रखें तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का प्रयास सफल नहीं हो पाएगा|
     इन तीनों ही प्रकारों की  महंगाई में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का नियंत्रण मात्र मांग प्रेरित  महंगाई पर ही होता है| अन्य दो प्रकार के महंगाई पर  रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का प्रभाव नगण्य होता है| संरचनात्मक महंगाई को नियंत्रित करने में सरकार की भूमिका सबसे खास होती है यदि सरकार इस काम में विफल हो जाए तो केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक के लगातार प्रयास के बाद भी महंगाई को नियंत्रित करना असम्भव हो जाएगा|

महंगाई की दर के आधार पर  महंगाई या मुद्रास्फीति को  चार मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है|

महंगाई जिस दर से  बढ़ती है, उस आधार पर इसे चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है|
  1. Creeping inflation: यदि  महंगाई की दर  3% तक रहे तब यह रेंगती हुई महंगाई या Creeping inflation कहलाती है| यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छा संकेत है| यह दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था में मांग कायम है एवं महंगाई पूर्ण नियंत्रण में है|
  2. Walking inflation: यदि महंगाई की दर 3% से ज्यादा हो एवं अधिकतम 10% तक हो तब यह चलती हुई महंगाई या Walking inflation कहलाती है| विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में यह एक सामान्य स्थिति है|
  3. Runaway inflation: यदि महंगाई की दर 10% से ज्यादा एवं अधिकतम 30% तक हो तब यह भागती हुई महंगाई या Runaway inflation कहलाते हैं यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है|
  4. Galloping/Hyper inflation: यदि महंगाई नियंत्रण से पूर्णता बाहर चले जाए एवं यह 30% से भी ज्यादा के दर से बढे तब यह चरम  महंगाई या Galloping/Hyper inflation कहलाती है|

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