किशोरी की निर्णय-एक हिंदी कहानी

यूँ तो उसकी उम्र कुछ बत्तीस-तैतीस ही रही होगी पर किस्मत की मारी किशोरी के पास ऐसा कुछ न था जिसमें वह विधाता को धन्यवाद दे| बंधे हुए पर बिखरे बाल जो शायद एकाध माह में खुलता रहा हो, रुखी आँखे, कमजोर शरीर, मुश्किल से एकाध चिथड़े कपड़े| हालाँकि उसके सुडौल उभार उसे स्त्रीत्व में धनी बनाते थे लेकिन वह सपने में भी नहीं चाहती थी की इसका पता दुनिया को चलें|  यदा कदा इसे महसूस कर, अपने स्त्री होने के अहसास भर से वह काँप जाती थी की अपनी अस्मिता की रक्षा इन परिस्थितियों में कैसे करें|
किशोरी की निर्णय-एक हिंदी कहानी

       किशोरी कब से ऐसी स्थिति में है, उस मंजर को याद नही करना चाहती| एक लाचार परिवार में जन्मी किशोरी का छोटी उम्र में ही एक मजदुर युवक से ब्याह कर दिया गया| उसका पति कोयला खदान में काम करता था|  विवाह के बाद वह भी खदान वाले साईट पर आ गई और उसी खदान में काम करने लगी| यहाँ उसकी जिदंगी और नर्क हो गई| उसका पति उसे बुरी तरह मारता पिटता था| शादी के 4 वर्ष में ही वो 2 बच्चो की माँ थी जबकि एक बच्चा गर्भ में ही खराब हो गया था| गर्भवती होने के छठे-सातवें माह तक उसे खदान में काम करना पड़ता था जबकि पोषण के नाम पर कुछ न था|

       अचानक एक दिन किशोरी के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसे किशोरी न अच्छा ही कह सकती थी और न ही बुरा| नशे में घर लौटते वक्त एक भयानक एक्सीडेंट में उसके पति की मौत की खबर उसे मिली| वह थोड़े दिनों में किसी तरह इस सदमें से बाहर आई, लेकिन एक रात घटना ने उसे तोड़ दिया| उसके पति के साथ काम करने वाले कुछ लोग ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की| कोई उपाय न सूझ पड़ने पर पास पड़े खदान वाले औजार से ही उसने उन पर वार किया और फिर …खून ही खून..सामने तीन लाशे पड़ी थी|
       किशोरी बहुत घबरा गई उसे कुछ भी समझ न आ रहा था| उसने अपने दोनों बच्चो को गोद में उठाया और रेलगाड़ी की पटरी पर भागने लगी| थोड़ी दुरी पर एक मालगाड़ी धीरे-धीरे खुल रही थी उसने बची खुची हिम्मत के साथ दौर लगाकर उसने बच्चो को मालगाड़ी पर फेंक दिया और खुद भी उस पर मालगाड़ी पर चढ़ गई|
 किशोरी की निर्णय-एक हिंदी कहानी
       …और इस भयानक याद के साथ वह इस जगह पर आ गई| नई शहर नई जगह यहाँ उसके पास कुछ भी ठिकाना न था, न ही वह पुरानी बातों को भूल पा रही थी| कुछ दिन बाद उसे अपना एक अस्थायी ठिकाना दिख ही गया| एक छोटी सी पुल के नीचे| यह जगह उसे बड़ी महफूज लगी, क्योंकि यहाँ कोई आता जाता नही था| पुल के उपर रेलगाड़ी की पटरियां थी, जिससे रोज कई  रेलगाड़ी गुजरती थी| इसके आलावा आस-पास नगर निगम की बड़ी बड़ी गाड़ियाँ रोज कचरा डालती थी| इस जगह को पाकर उसे इतनी सुकून मिली जैसे उसे कोई राजमहल मिल गया हो| वह अपने दोनों बच्चो के साथ वही रहने लगी|
        उसे अपने बच्चों की बड़ी फिक्र थी वह दिन में भरसक काम तलाशने की कोशिश करती लेकिन उसे इस अवस्था में कोई काम नसीब नही हो रहा था| हारकर भूख के आगे मजबूर होकर वह लोगो के आगे हाथ फैलाने लगी| इसी तरह कुछ दिन बीते| बच्चो को पुल के नीचे ही छोड़कर वह अकेले भीख मांगने जाती और घंटे-दो घंटे में आकर बच्चो को देख जाती थी उसका रोज का यही रूटीन था|

       एक दिन किशोरी के जीवन में एक और नया मोड़ आया| इस बार भी वह कुछ समझ पाती इससे पहले ही सबकुछ घटित हो गया|  लोगो की नजरो से बचते बचाते एक दिन वह जल्दी-जल्दी अपने ठिकाने पर लौट रही थी|  तभी उसे टिक टिक की अजीब सी आवाज सुनाइ दी| वह इस आवाज को अच्छे से पहचानती थी| यह आवाज डायनामाईट (एक प्रकार का बम) की थी, जो पत्थर तोड़ने में प्रयोग होती थी|

      उसके कदम ठिठक गये| तो क्या ..यह बम पटरी उड़ाने के लिए लगाया गया है? उसे याद आया की लगभग इसी समय रोज ही इस पटरी से एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी गुजरती है| वह कुछ भी सोच नही पा रही थी| अचानक उसने टिक टिक की दिशा में दौड़कर देखा| थोरी ही दुरी पर, उसके ठिकाने वाले पुल के नजदीक ही दो-तीन बम लगाये गये थे| किशोरी ने अंदाजा लगाया की रेलगाड़ी आती ही होगी| इधर बम फटने में कुछ ही समय बचा था| उसे एक तरफ अपने बच्चों की चिंता थी तो दूसरी तरफ पूरी रेलगाड़ी की अनगिनत सवारियों की|

      उसने विचार किया की अगर बच्चे यहीं रहें तो निश्चित ही बम फटने के साथ उड़ जाएँगे| अगर बच्चों को हटाने के लिए वह पुल के नीचे गई तो शायद वह और उसके बच्चे बच जाएँ लेकिन रेलगाड़ी और रेलगाड़ी के यात्री कतई नहीं बच पाएँगे| किशोरी ने अपना दिल कड़ा किया| एक बार उपर से ही निहारकर अपने बच्चों से विदा लिया और जिधर से रेलगाड़ी आने वाली थी उस दिशा में दौरने लगी|

       उसके पास ट्रेन रोकने के लिए कुछ न था| उसे अचानक ख्याल आया की उसके पहने हुए चीथड़े कपड़े लाल रंग के है| वह तेजी से दौड़कर खम्भे तक पहुंची और अपनी साड़ी की एक छोड़ साइड में खड़े सिग्नल के खम्भे में और दूसरी एक डंडे द्वारा बांध दी| वह निहारकर संतुष्ट हो ली की इससे ट्रेन रुक जाएगी| लेकिन अब वह फिर उसी अवस्था में, ट्रेन की दिशा में दौड़ने लगी|

       कुछ ही देर में ही उसे ट्रेन आती दिखी| अब उसे अपने अंदर बहुत ही ऊर्जा जान पड़ी| वह पूरी शक्ति के साथ रेलगाड़ी की ओर दौड़ पड़ी जैसे उसे मोक्ष मिलने जा रहा हो..| कुछ ही क्षण में रेलगाड़ी उसके उपर से गुजरती हुई उसके बांधे हुए साड़ी के नजदीक रुक गई| उधर बम पटरी व किशोरी के बच्चों को ले उड़ा था| लेकिन ट्रेन समय से रुक जाने के कारण सभी रेल यात्री सुरक्षित थे| रेल प्रशासन और यात्री सभी किशोरी द्वारा दी गई बलिदान के कारण किशोरी के प्रति श्र्द्धान्वित थे| बाद में उस पूल को जिसे किशोरी ने अपना ठिकाना बनाया था उसे किशोरी ब्रिज का नाम दिया गया|

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