विशेष राज्य दर्जा का मामला क्या है?

विशेष राज्य दर्जा केंद्र द्वारा राज्य को कुछ निर्धारित मानदंडों को पूरा करने पर प्रदान किया जाता है| इस दर्जा के प्राप्त होने पर विशेष राज्य दर्जा प्राप्त राज्य को कई प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होती है| हालाँकि संविधान में किसी राज्य को विशेष श्रेणी का दर्जा प्रदान करने से सम्बन्धित कोई प्रावधान नहीं मिलता है| हम इस पोस्ट में इससे सम्बन्धित विभिन्न बातों पर विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे| हम यह चर्चा करेंगे की विशेष राज्य का दर्जा या विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा  क्या है? इससे राज्यों को क्या सुविधाएँ मिलती है? इसके लिए मानदंड क्या है? विशेष राज्य दर्जा प्राप्त राज्य कौन-कौन से है? इस सम्बन्ध में 14वें वित्त आयोग की क्या सिफारिशें थी? इन प्रश्नों के उत्तर पर विचार करने के पश्चात हम इसके निष्कर्ष पर भी चर्चा करेंगे| आइये चर्चा की शुरुआत करते है|

विशेष राज्य दर्जा

विशेष राज्य दर्जा क्या है?


यह केंद्र द्वारा राज्यों को प्रदान किया जाने वाला एक दर्जा या श्रेणी है| इस दर्जा को प्राप्त करने वाले राज्यों को केंद्र से विभिन्न प्रकार की रियायतें एवं सहायता प्राप्त होती है| इस दर्जा को प्राप्त करने के लिए राज्यों की कुछ विशेष स्थिति होनी चाहिए| यह मानदंड क्या होनी चाहिए आइये इसे समझते है|

विशेष श्रेणी के राज्य के लिए मानदंड

किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त करने के लिए निम्न मानदंडो को पूरा करना होता है-

  • उस राज्य में पहाड़ी इलाका तथा दुर्गम क्षेत्र हो,
  • उस राज्य की आबादी का घनत्व कम हो,
  • उस राज्य में जनजातीय आबादी अधिक हो,
  • उस राज्य की सीमा अंतर्राष्ट्रीय सीमा हो, अर्थात वह सीमावर्ती राज्य हो,
  • वह राज्य आर्थिक एवं आधारभूत संरचना की दृष्टि से पिछड़ा हो,
  • राज्य की आय की प्रकृति निर्धारित नही हो|

विशेष राज्य दर्जा से लाभ

अभी हाल ही में आन्ध्र प्रदेश के सांसदों द्वारा आन्ध्र प्रदेश राज्य के लिए विशेष श्रेणी की मांग की गई थी| जिसे स्वीकार नही किया गया लेकिन यह मांग हाई वोल्टेज ड्रामा के रूप में संसद कार्य में विक्षोभ उत्पन्न करता रहा है| 2013 में बिहार राज्य द्वारा भी विशेष श्रेणी के राज्य के दर्जे की मांग की गई थी, इसी तरह राजस्थान भी इस तरह की मांग कर चूका है| प्रश्न यह उठता है की आखिर विशेष राज्य दर्जा से लाभ क्या है जिसके मांग के लिए राज्य सदैव केंद्र पर दबाब बनाते है|

लाभ

  • इस दर्जा को प्राप्त करने के बाद केंद्र द्वारा राज्यों को प्रदान की गई धनराशी 90 % अनुदान के रूप में होती है तथा 10 % ऋण के रूप में| जबकि सामान्य दर्जे वाले राज्य को केंद्र द्वारा प्रदान की गई राशि का कुछ ही भाग अनुदान के रूप में होता है तथा अधिकतर भाग ऋण के रूप में होता है
  • इस दर्जे के प्राप्त होने के बाद राज्यों को केंद्र से कई टैक्स से छूट मिलती है तथा स्पेशल पॅकेज भी प्राप्त होता है|
  • राज्य में विकास सुनिश्चित करने हेतु अन्य कई राहत, सुविधाएँ केंद्र द्वारा प्रदान किया जाता है|

विशेष राज्य दर्जा प्राप्त राज्य

वर्तमान स्थिति के अनुसार देश के निम्न 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है-

  1. असम- 1969 में
  2. नागालैंड- 1969 में
  3. जम्मू & कश्मीर- 1969 में
  4. हिमाचल प्रदेश- 1971 में
  5. मणिपुर- 1972 में
  6. मेघालय- 1972 में
  7. त्रिपुरा- 1972 में
  8. मिजोरम- 1975 में
  9. अरुणाचल प्रदेश-1975 में
  10. सिक्किम- 1975 में
  11. उत्तराखंड – 2001 में

ये सभी राज्य दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित है यहाँ व्यापक स्तर पर सामाजिक आर्थिक विषमताएं होने के साथ ये बुनियादी निर्माण तथा विकास दर में भी पिछड़े क्षेत्र है|

संविधान में किसी राज्य को विशेष राज्य दर्जा प्रदान करने से सम्बन्धित कोई प्रावधान नही मिलता है| वर्ष 1969 तक राज्यों को अनुदान प्रदान करने का केंद्र के पास कोई निश्चित रोड मैप नही था| 1969 में बनाये गये गाडगिल फर्मुलें से राज्यों को केंद्र द्वारा अनुदान प्रदान करने का एक निश्चित रोडमैप तैयार हुआ| यही से विशेष श्रेणी की दर्जे की बात निकलकर सामने आई| अतः यह कहा जा सकता है की विशेष राज्य दर्जे की अवधारणा गाडगिल फार्मुले की देन  है|

गाडगिल फार्मुले का अनुमोदन 5 वें वित्त आयोग ने किया और उसी वर्ष तीन राज्यों को असम, नागालैंड और जम्मू&कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया| बाद के वर्षों में 5 और पूर्वोत्तर राज्यों को तथा तीन अन्य राज्यों को यह दर्जा दिया गया| समय के साथ बदलती आवश्यकताओं के अनुसार गाडगिल फर्मुलें में कई बार संसोधन किया गया| 1991 में गाडगिल-मुखर्जी फार्मूला को उपयोग में लाया गया जो 14 वें वित्त आयोग तक प्रयोग में लाया गया| 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश के बाद केंद्र का कहना है की अब किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा नहीं प्रदान किया जा सकता|

वित्त आयोग  का गठन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है| संविधान के अनुच्छेद 280 में इसकी चर्चा मिलती है| आमतौर पर इसका गठन पांच वर्ष पर किया जाता है| वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच कर के बंटवारे को तय करता है| इसके आलावा यह सिफारिश करता है की भारत की संचित निधि से राज्यों को कितना अनुदान दिया जाएँ|

14वें वित्त आयोग की सिफारिश तथा केंद्र का पक्ष

  • केंद्र सरकार का पक्ष है की 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश के बाद किसी भी राज्य को ऐसा कोई दर्जा नहीं प्रदान किया जा सकता है|
  • वित्त मंत्री के अनुसार- 14 वें वित्त आयोग द्वारा केन्द्रीय कर राजस्व में राज्यों का हिस्सा 32 % से बढाकर 42 % कर दिया गया है, जिससे सभी राज्यों को पहले की तुलना में 50 % अधिक अंतरण प्राप्त होगा| इसीलिए अब विशेष श्रेणी के दर्जे का कोई औचित्य ही नही बनता|
  • 14 वें वित्त आयोग के मुताबिक जिन राज्यों को राजस्व घाटा हो रहा था, उन्हें मुआवजा देने के प्रावधानों को पूरा किया जाना चाहिए| अब विशेष दर्जे की कोई बात नही हो सकती|

निष्कर्ष

योजना आयोग की समाप्ति के बाद विशेष राज्य दर्जे वाले राज्यों को प्रदान की गई अनुदान में काफी कटौती की गई है| वर्तमान में दर्जे प्राप्त तथा सामान्य राज्य को आवंटित किये गये अनुदान में अंतर काफी कम हो गया है| कर राजस्व अंतरण को बढाकर 42 % किये जाने के बाद राज्यों को प्रदान किये गये केन्द्रीय सहायता में कमी आना मुनासिब है और ऐसे में दर्जे प्राप्त राज्य को प्रदान किया गया लाभ भी कम हो गये है| अब यह राजनितिक लाभ का प्रतीक भर रह गया है|

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