राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की जानकारी हिंदी में

राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को राष्ट्रपति की प्रमुख शक्ति एवं कार्य कहा जा सकता है| भारत के राष्ट्रपति अधिकारिक रूप से भारत राज्य के प्रमुख होते है और  हालाँकि वास्तविक अर्थो में सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होते है एवं राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के सलाह के अनुसार कार्य करता है| भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को कई तरह की शक्तियां, कार्य, कर्तव्य एवं दायित्व प्रदान किये गये है| इनमें राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को प्रमुख शक्ति के रूप में देखा जा सकता है| राष्ट्रपति किसी भी समय अध्यादेश को जारी कर सकता है तथा इसे वापस ले सकता है| हालाँकि वह इसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिमंडल की सलाह पर ही जारी करता है अथवा वापस लेता है| हम इस पोस्ट में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की सारगर्भित और सरल चर्चा करेंगे| हम यह भी देखेंगे की राष्ट्रपति की अध्यादेश की विशेषताएँ क्या है, इसे संविधान में अपनाने का कारण क्या था? इसकी सीमाएं क्या है? आइये चर्चा  की शुरुआत करते है|

राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की चर्चा मिलती है| इसके अनुसार जब संसद सत्र न चल रहा हो तब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है|

राष्ट्रपति की अध्यादेश की विशेषताएँ


अध्यादेश की विशेषताएँ इस प्रकार है-

  • अगर समय सीमा को अपवाद मान लिया जाये तो यह पूरी तरह संसद द्वारा बनाये गये कानून के बराबर होती है|
  • संसद द्वारा अनुमोदन किये जाने के पश्चात यह पूर्ण कानून बन जाता है|
  • संसद के दोनों सदनों के बाद वाले बैठक से 6 हफ्ते के भीतर अनुमोदन न किये जाने पर यह स्वतः समाप्त हो जाता है|
  • राष्ट्रपति किसी भी समय इसे स्वयं वापस ले सकता है|
  • यदि इसे संसद पटल पर रखने से पूर्व ही राष्ट्रपति द्वारा वापस ले लिया जाता है तो इसके अंतर्गत किये गये कार्य वैध व प्रभावी बने रहेंगे|
  • राष्ट्रपति इसे प्रधानमंत्री की नेतृत्व वाली मंत्रीपरिषद की सलाह पर जारी करता है अथवा वापस लेता है|

राष्ट्रपति की अध्यादेश की प्रभाव एवं महत्व विधयिका द्वारा पारित कानून के बराबर होती है| लेकिन राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति विधयिका के समानांतर शक्ति नहीं है| ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता है-

  • राष्ट्रपति इसे तभी जारी कर सकता है जब संसद सत्र न चल रहा हो
  • अध्यादेश जारी करने के 6 हफ्ते के भीतर संसद का अनुमोदन किया जाना चाहिए अन्यथा यह समाप्त हो जाएगा|
  • 44 वें संविधान संसोधन द्वारा यह प्रावधान लाया गया है राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की इस निर्णय को असद्भाव के आधार पर न्यायिक चुनौती दी जा सकती है|

इस तरह के अनेकों आधार पर कहा जा सकता है की राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति विधायिका के समानांतर शक्ति नही है परन्तु इसका व्यापक महत्व है इसे इस तरह समझा जा सकता है|

अध्यादेश के प्रावधान को संविधान में अपनाने का कारण

किसी कानून के संसद द्वारा पारित होने की एक लम्बी तथा जटिल प्रक्रिया होती है| ऐसे में संसद सत्र जारी नही रहने की स्थिति में किसी कानून का बनना संभव नही था| इस स्थिति में किसी आवश्यक कार्य के लिए कानून बनाने की व्यवस्था किया जाना निहायत जरुरी था| इस संदर्भ में राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति का विशेष महत्व है| जब संसद सत्र न चल रहा हो इस स्थिति में राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति होती है|

इसके महत्व के संदर्भ में डा. अम्बेडकर का कहना था की अध्यादेश जारी करने की प्रक्रिया राष्ट्रपति को उस परिस्थिति से निपटने में सक्षम बनाती है जो आकस्मिक व अचानक उत्पन्न होती है और जब संसद के सत्र कार्यरत नही होते है|

राष्ट्रपति की अध्यादेश की सीमाएं


राष्ट्रपति की अध्यादेश की निम्न सीमाएं कही जा सकती है-

  • जब संसद का दोनों सत्र चल रहा हो तो तब अध्यादेश नही जारी किया जा सकता| इसके पीछे तर्क है की राष्ट्रपति की यह शक्ति विधायिका के समानांतर नही बल्कि वैकल्पिक है|
  • संविधान संसोधन हेतु अध्यादेश नही लाया जा सकता है| हालाँकि यह किसी भी विधि, संसद के कार्य, अन्य नियम आदि को संसोधित कर सकता है|
  • इसके द्वारा मौलिक अधिकार को खत्म या कम नही किया जा सकता है|
  • अध्यादेश केवल उन्ही विषयों पर जारी किया जा सकता है जिस पर  संसद कानून बना सकती है|
  • इसे भी पूर्व तिथि से प्रभावी नहीं बनाया जा सकता| जिस तरह विधायिका के किसी कानून को पूर्व तिथि से प्रभावी नही बनाया जा सकता (कर कानून को छोड़कर) उसी तरह अध्यादेश को भी पूर्व तिथि से प्रभावी नहीं बनाया जा सकता|
  • राष्ट्रपति इसे तभी जारी कर सकता है जब वह संतुष्ट हो की मौजूदा परिस्थिति में उसे अध्यादेश जारी किया जाना आवश्यक है| राष्ट्रपति की इस संतुष्टि को 44 वें संविधान संसोधन द्वारा न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत रखा गया है| 44 वें संविधान संसोधन द्वारा राष्ट्रपति की संतुष्टि को असद्भाव के आधार पर न्यायिक चुनौती दी जा सकती है|
  • संसद सत्र के बैठक के 6 हफ्ते के भीतर अध्यादेश के अनुमोदन न किये जाने पर यह स्वतः समाप्त हो जाता है| यदि संसद के दोनों सदन की बैठक अलग अलग तिथि पर हो तब 6 हफ्ते की समय सीमा बाद वाले बैठक से गिनी जाएगी|

प्रिय विजिटर इस तरह आपने अवेयर माय इंडिया के हिंदी आर्टिकल राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति  को पढ़ा| अगर आपका इससे संबंधित कोई प्रश्न या सुझाव हो तो कमेंट जरुर करें| आशा है की हमारे अन्य आर्टिकल की तरह ही आप इस आर्टिकल से भी लाभान्वित होंगे| हम इस बात को महसूस कर रहे है की आपके और बेहतर सुविधा के लिए इस साईट में कई सुधार किया जाना अपेक्षित है| आप सरीखे विजिटर के स्नेह और सुझाव से हम इस साईट में निरंतर सुधार कर रहे है और हमें विश्वास है की आगे के समयों में हम आपको और भी बेहतर सुविधा दे पाएंगें| लेकिन इस हेतु आपसे अनुरोध है की आप हमारे कांटेक्ट अस पेज के माध्यम से अपना विचार एवं अपना बहुमूल्य सुझाव हम तक जरुर प्रेषित करें| इस आर्टिकल को पढ़ने तथा अवेयर माय इंडिया साईट पर विजिट करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|

यह भी पढ़े

Leave a Reply

Your email address will not be published.