संसदीय विशेषाधिकार का मुद्दा

कुछ समय से संसदीय विशेषाधिकार का मुद्दा काफी चर्चा में रहा है| कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दो पत्रकारों को कारावास का आदेश एवं इससे पूर्व तमिलनाडु विधान सभा अध्यक्ष द्वारा पांच पत्रकारों के गिरफतारी के निर्दश के बाद संसद के विशेषाधिकार को लेकर अनेक प्रश्न उठाये जाने लगे| हम यहाँ इन्ही संदर्भ में बात करेंगे| हम चर्चा करेंगे की संसदीय विशेषाधिकार क्या है? भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे कहाँ से ग्रहण किया गया? यह कितना सही और कितना गलत है? हम कुछ निष्कर्षों पर भी बात करेंगे| आइये चर्चा की शुरुआत करते है|

संसदीय विशेषाधिकार क्या है

संसदीय विशेषाधिकार क्या है


विधायिका को उनके कार्यों एवं दायित्वों के उचित निर्वहन के लिए कुछ विशेष तरह के अधिकार प्राप्त होते है इन्हें संसदीय विशेषाधिकार कहा जाता है| यह विशेष अधिकार केन्द्रीय विधायिका अर्थात संसद के दोनों सदनों एवं राज्य विधायिका अर्थात राज्य विधानसभा के दोनों सदनों को प्राप्त है|

इन विशेषाधिकारों को सामूहिक एवं व्यक्तिगत दोनों रूपों में प्रदान किया गया है| सामूहिक विशेषधिकार से तात्पर्य है की सदन इस विशेषधिकार का प्रयोग सदन के संदर्भ में सामूहिक रूप से करता है| जैसे वह सदन की चर्चा, रिपोर्ट आदि कार्यवाही को प्रकाशित करने से मना कर सकता है और इसके बाबजूद प्रकाशित किये जाने पर प्रकाशक एवं पत्रकार को दण्डित कर सकता है|

व्यक्तिगत विशेषाधिकार से तात्पर्य है की प्रत्येक सदस्य को प्राप्त होने वाले व्यक्तिगत विशेष तरह के अधिकार| इसका प्रयोग सदस्य निजी रूप में करते है जैसे संसद में दिए गये मत, विचार, भाषण आदि के सन्दर्भ में वह कही भी न्यायिक आरोपी नहीं बनाया जा सकता, संसद सत्र चलने के 40 दिन पूर्व और 40 दिन बाद तक उसे गिरफ्तार नही किया जा सकता आदि| इस तरह के कई व्यक्तिगत विशेषाधिकार विधायिका को प्राप्त है|

सामूहिक एवं व्यक्तिगत विशेषधिकार का प्रदान किया जाना विधायिका के कार्यों एवं दायित्वों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक थ| इस बात को बेहतर समझने के लिए इसके स्त्रोतों को समझना आवश्यक होगा|

इन विशेष अधिकार की संकल्पना को इंग्लैण्ड से लिया गया है| वहां विधायिका को राजा के कुप्रभाव से बचाने एवं दायित्वों के उचित निर्वहन के लिए इस तरह के विशेषाधिकार प्रदान किये गये थे| स्वतंत्र भारत के संविधान में भी विशेष अधिकार की संकल्पना को अपनाया गया| इसके पीछे तर्क था की-

  • अगर विधयिका के विधयिक अभिव्यक्ति को न्यायिक जांच के अंतर्गत रखा गया तो इससे कार्यों एवं दायित्वों के निर्वहन में बाधा उत्पन्न होगी|
  • प्रकाशन से न रोके जाने पर संसदीय गरिमा का उलंघन हो सकता है|
  • इससे किसी देश के लिए संवदेनशील बातों का पर्दाफाश हो सकता है|
  • सदस्यों को झूठे आरोप में फंसाकर गिरफ्तारी आदि से कार्यों में विलम्ब उत्पन्न किया जा सकता था|
  • संसदीय मर्यादा की गरिमा भंग किया जा सकता था|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 एवं अनुच्छेद 194 में विशेषाधिकार के प्रावधान मिलता है| यह क्रमशः संसद एवं राज्य विधायिका के विशेषाधिकार के बारे में बताता है| यह प्रावधान विधायिका को उनके मतों एवं व्याख्यान के लिए कानून के दायरे से बाहर करता है तथा सम्बन्धित लोगों को उनके दायरे के अधीन करता है|

लेकिन विशेषाधिकारों के उलंघन और उसके सजा के निर्धारण हेतु स्पष्ट नियमों का आभाव है| यही कारण है की विधायिका के विशेष अधिकार से सम्बन्धित दिए गये दंड पर विभिन्न प्रश्न उठाया जाता रहा है|

कितना सही कितना गलत


संसदीय विशेषाधिकार का बहस के मुद्दे के रूप में बदल जाने पर इस बात की जांच की अनिवार्यता बढ़ जाती है की इसका सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष क्या है| आइये संसदीय विशेषधिकार के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष पर विचार करते है|

सकारात्मक पक्ष

  • विशेषधिकार विधायिक सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते है|
  • विशेषाधिकार रहित होकर सदन अपने अधिकार, गरिमा और सम्मान को बनाये रखने में असमर्थ होगा तथा इसके बिना यह अपने सदस्यों के कर्तव्यों के निर्वहन में किसी अवरोध से सुरक्षा प्रदान करने में भी सक्षम नही होगा|

नकारात्मक पक्ष

  • इन विशेषाधिकारो का प्रेस एवं मिडिया की स्वतंत्रता के साथ टकराव होता है तथा कभी-कभी मिडिया द्वारा सांसदों या विधायिका की आलोचना किये जाने पर भी इसका अनुचित प्रयोग किया जाता है|
  • इसका दुरूपयोग कभी-कभी क़ानूनी कार्यवाही के विकल्प के रूप में भी किया जाता है|
  • ऐसे विशेषाधिकार विधयिका को स्वयं ही न्याय का अधिकार प्रदान करता है, इससे न्याय सुनिश्चित हो पाना कठिन हो जाता है| इससे अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई की मुलभुत अधिकार का भी उलंघन होता है|

निष्कर्ष


  • संसदीय विशेषाधिकार को सूचीबद्ध किये जाने के साथ ही स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए|
  • विशेषधिकार हनन की स्थिति में एक सुनिश्चित प्रक्रिया का निर्धारण किया जाना चाहिए|
  • विधयिका को अपने विशेषधिकार का उपयोग अवमानना एवं विशेषाधिकार के उलंघन के वास्तविक केस में ही करना चाहिए ताकि संसदीय सदन एवं सदस्य के स्वतन्त्रता के रक्षा होने के साथ ही आलोचकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हो सके|

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