सूर्य नमस्कार सभी के लिए क्यों जरुरी है, खासकर किशोरों के लिए इसका क्या महत्व है?

सूर्य नमस्कार को एक अद्भुत अभ्यास कहा जा सकता है| इसे समग्र योग प्रक्रिया कहा जाता है| अगर इसके महत्ता एवं लाभ की बात करें तो यह एक ऐसा अभ्यास है जिस पर जैसे-जैसे शोध हो रहा है इसके लाभ के नये-नये आयाम खुलकर सामने आ रहे है| महर्षियों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने सूर्य नमस्कार के अनेकों लाभ बताएं है| इस अर्थ में यह विज्ञान एवं अध्यात्म के मेल को भी प्रदर्शित करता है| हम इस आर्टिकल में सूर्य नमस्कार के बारे में विस्तृत बातें करेंगे| हम देखेंगे की इसकी महत्ता और लाभ क्या है? सूर्य नमस्कार करने की सही विधि क्या है?  हम यह भी देखेंगे की किशोरों के लिए सूर्य नमस्कार कितना लाभकारी है? इस दरम्यान हम सूर्य नमस्कार करने के लिए मुख्य सावधानियों पर भी थोड़ी बात करेंगे आइये आर्टिकल की शुरुआत करते है. Surya Namaskar in hindi.

सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार का महत्ता


सूर्य प्राणायाम के अनन्य लाभ है| इसके महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की इसके ज्ञात हो चुके लाभों के वर्णन में एक मोटी पुस्तक कम पड़ जाएगी जबकि इसके लाभ के नये-नये पह्लुएँ वैज्ञानिक शोध में आये दिन उजागर होते रहते है| ऐसे में स्पष्ट है की आर्टिकल के सीमित शब्दों में इसके लाभों को वर्णित कर पाना एक दुष्कर कार्य है| तथापि एक प्रयास के रूप में इसके लाभों की संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है|

  • सूर्य नमस्कार के अभ्यास से सम्पूर्ण शरीर चैतन्य हो जाता है| निष्क्रिय अंग सक्रीय हो उठते है और जहाँ अति सक्रियता होती है वह नियंत्रित हो जाती है| सूर्य नमस्कार के विभिन्न आसनों का शरीर के विभिन्न अंगों पर विशिष्ट प्रभाव होता जिसके अनेक लाभ होते है| इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-
    • प्रणामासन-
      • अंतर्मुखियता,
      • शिथिलीकरण
      • शांति की स्थितियाँ
    • हस्तउत्तानासन-
      • उदर की मालिश,
      • पाचन में सुधार,
      • मेरुदंड का व्यायाम,
      • मोटापा में कमी,
      • थायराइड ग्रंथि पर प्रभाव
    • पादहस्तासन-
      • यकृत, वृक्क, पित्ताशय, अग्न्याशय, एड्रिनल ग्रंथि, पर प्रभाव,
      • उदर संबंधी बीमारियाँ से छूटकारा,
      • पाचन शक्ति का विकास,
      • मस्तिष्क में रक्त का सुचारू प्रवाह
      • सम्पूर्ण अन्तःस्त्रावी तंत्र पर प्रभाव
    • अश्वसंचालनासन-
      • उदर की पेशियों में खिंचाव
      • श्रोणी प्रदेश में खिंचाव
      • साईनस में राहत
    • पर्वतासन-
      • भुजाओं तथा पैरो की पेशियों का मजबूत होना
      • मेरुदंड के स्नायु का सबल होना
      • पिंडलियों की पेशियों में खिंचाव एवं मजबूती
    • अष्टांग नमस्कार आसन-
      • वक्षस्थल में मजबूती
      • बांह, कंधे और पाँव की शक्ति में बढ़ोतरी
    • भुजंगासन-
      • वक्ष एवं उदर पर दबाब
      • दमा, कब्ज, अपच, गुर्दे और यकृत आदि की रोग से छुटकारा
  • विभिन्न रोगों से मुक्ति- इसका अभ्यास विभिन्न रोगों से मुक्त कर शरीर को स्वस्थ्य बनता है| इससे फोड़े-फुन्सिया, अग्नि मंदता, रक्ताल्पता, दुर्बलता, गठिया, दमा, सिर दर्द, स्थूलता, फेफड़े सम्बन्धी दोष, अपच, कब्ज, गुर्दे के रोग, मधुमेह, निम्न रक्तचाप, मिर्गी, यकृत संबंधी रोग, अन्तः स्त्रावी ग्रंथियों का असंतुलन तथा विभिन्न प्रकार के मनोरोग आदि का नाश होता है|
  • अध्यात्मिक जागरण- सूर्य नमस्कार के अभ्यास से इड़ा-पिंगला नाड़ियों में संतुलन स्थापित होता है तथा व्यक्ति का अध्यात्मिक मार्ग खुलता है| प्रत्येक आसन का व्यक्ति के अंदर अवस्थित महाशक्ति पुंज चक्र पर प्रभाव पड़ता है| सूर्य नमस्कार के निम्न आसनों का निम्न चक्रों पर प्रभाव पड़ता है|
    • प्रणामासन- अनाहत चक्र..
    • हस्तउत्तानासन- विशुद्धि चक्र
    • पादहस्तासन- स्वाधिष्ठान चक्र
    • अश्वसंचालनासन- आज्ञा चक्र
    • पर्वतासन- विशुद्धि चक्र
    • अष्टांग नमस्कार आसन- मणिपुर चक्र
    • भुजंगासन- स्वाधिष्ठान

इस तरह विभिन्न स्थिति में विभिन्न चक्र का जागरण होता है| इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा हम किसी अन्य आर्टिकल में करेंगें|

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बालक तथा किशोरों के लिए सूर्य नमस्कार का विशेष लाभ

बालक तथा किशोर के लिए सूर्य नमस्कार विशेष रूप से लाभकारी है|

  • शारीरिक मानसिक रोग का नाश- किशोरावस्था के साथ अनेक प्रकार की भावनात्मक समस्याएँ पैदा होने लगती है| इस स्थिति में किशोर मन इन भावनात्मक आघातों को नहीं सह पाता है और इससे व्यक्तित्व में उलझाव आने लगता है| फलस्वरूप अनेक प्रकार के शारीरिक-मानसिक रोग पनपने लगता है| इस स्थिति को सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से रोका जा सकता है| इसीलिए किशोरों के लिए सूर्य प्राणायाम करना बहुत आवश्यक है|
  • पीनियल ग्रन्थि के क्षय का नियंत्रण- 8 वर्ष की आयु से पीनियल ग्रन्थि का क्षय शुरू हो जाता है तथा 12-14 वर्ष में यौवन प्रारम्भ होने लगता है| शारीरिक और भावनात्मक विकास का यह असंतुलन किशोर का व्यक्तित्व पर प्रतिकूल असर डालता है| इससे उनकी सफलता में संदेह उत्पन्न होती है| सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और भावनात्मक विकास की इस असंतुलन को दूर किया जा सकता है| जिससे व्यक्तित्व के उत्तम विकास के साथ ही हर क्षेत्र में सफलता सुनिश्चित की जा सकती है|
  • सूर्य नमस्कार से बालको तथा किशोरों का प्रतिभा-मेधा संवर्धन भी होता है| इस संदर्भ में कुछ सर्वेक्षण भी किये जा चुके है| ऐसे स्थान जहाँ विद्यार्थियों को नियमित रूप से सूर्य नमस्कार कराया जाता है के मुकाबलें ऐसे स्थान जहाँ बालकों को अभ्यास नहीं कराया जाता में विद्यार्थियों के प्रगति का स्तर काफी कम था| प्रगति का स्तर सिर्फ शैक्षणिक कार्य में ही नहीं खेल कूद, सामाजिक प्रतियोगिता आदि में भी कम था| इसीलिए बालक तथा किशोरों के समग्र विकास के लिए सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास काफी महत्व रखता है|

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सूर्य नमस्कार करने की सही विधि क्या है?


सूर्य नमस्कार कैसे करें? हिंदी में जानकारी

  • अभ्यास का सही समय-  वैसे तो इस अभ्यास को सूर्योदय के समय करना ज्यादा लाभकारी होता है पर यदि किसी कार्यवश सुबह में इसका अभ्यास न किया जा सकें तो इसे दिन में भी कभी भी खाली पेट किया जा सकता है|
  • उचित वातावरण का चुनाव- इस अभ्यास को जितना ज्यादा संभव हो खुली हवा में ढीले कपड़े पहन कर करना चाहिए| अगर संभव हो तो कपड़ा ऐसा होना चाहिए जिससे त्वचा आसानी से सूर्य ऊर्जा को ग्रहण कर सकें|

सूर्य नमस्कार करने की विधि

सूर्य नमस्कार करने की विधि इस प्रकार है-

सूर्य नमस्कार में 12 स्थितियों का अभ्यास किया जाता है| इसमें 7 मुख्य आसन आते है और शेष 5 स्थिति में उन्हीं आसनों को दोहराया जाता है| आइये एक-एक अवस्था को अलग-अलग समझते है|

1. प्रणामासन– दोनों पैर मिलकर खड़े हो| दोनों हाथों को जोड़कर सीने के पास प्रणाम की मुद्रा में रखें| दृष्टि को सामने की ओर रखें|

प्रणामसन
प्रणामासन

 


2. हस्तउत्तानासन- दोनों हाथों को श्वास भरते हुए  ऊपर उठाये|

हस्तउत्तानासन
हस्तउत्तानासन

3. पादहस्तासन- श्वास छोड़ते हुए  मस्तक को घुटने से व हाथों को जमीन से लगाने का प्रयास करें|

पादहस्तासन
पादहस्तासन

4. अश्वसंचालनासन- एक पैर को पीछे ले जाएँ व दोनों हाथों को (आगे वाले पैर के पास) एक साथ रखें| छाती को ऊपर उठायें|

अश्वसंचालनासन
अश्वसंचालनासन


5. दण्डासन व पर्वतासन- दोनों हाथों को आगे रखें व दोनों पैरों को पीछे ले जाएँ| इसमें शरीर की दशा डंडे के समान होती है| इसी आसन को पर्वतासन में बदला जाता है- इसमें श्वास छोड़ते हुए  मस्तक को जमीन से लगाया जाता है, कमर आसमान की तरफ निकलते हुए नाभि देखने का प्रयास किया जाता है| दण्डासन और पर्वतासन दोनों एक ही आसन के अंतर्गत रखा जाता है|

दण्डासन व पर्वतासन
दण्डासन
पर्वतासन
पर्वतासन

 


6. अष्टांग नमस्कार आसनश्वास छोड़ते हुए  घुटने, छाती, ठुड्डी व मस्तक को जमीन पर लगाये|

अष्टांग नमस्कार आसन
अष्टांग नमस्कार आसन

7. भुजंगासन- दोनों हाथों को कंधे के पास रखते हुए धड़ वाले हिस्से को ऊपर उठाते है| यह क्रिया श्वास लेते हुए  किया जाता है|

भुजंगासन-
भुजंगासन

8. पर्वतासन व दण्डासन– स्थिति 5 को दोहराएँ|


9. अश्वसंचालनासन– स्थिति 4 को दोहराएँ|


10. पादहस्तासन- स्थिति 3 को दोहराएँ|


11. हस्तउत्तानासन- स्थिति 2 को दोहराएँ|


12 .प्रणामसन- स्थिति 1 में वापस आ जाएँ|


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सूर्य नमस्कार के अभ्यास में सावधानी


  • वैसे तो यह प्रत्येक आयु वर्ग के लोगो के लिए समान रूप से उपयुक्त है परन्तु अधिक उम्र के लोगों को अधिक तनाव से बचना चाहिए|
  • उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेसर) या हर्ट अटैक से पीड़ित व्यक्ति को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए|
  • मेरुदंड की समस्या से ग्रसित व्यक्ति को भी यह अभ्यास नही करना चाहिए|

प्रिय विजिटर इस तरह आपने अवेयर माय इंडिया के हिंदी आर्टिकल ‘सूर्य नमस्कार सभी के लिए क्यों जरुरी है, खासकर किशोरों के लिए इसका क्या महत्व है?’ को पढ़ा| अगर आपका इससे संबंधित कोई प्रश्न या सुझाव हो तो कमेंट जरुर करें| आशा है की हमारे अन्य आर्टिकल की तरह ही आप इस आर्टिकल से भी लाभान्वित होंगे| हम इस बात को महसूस कर रहे है की आपके और बेहतर सुविधा के लिए इस साईट में कई सुधार किया जाना अपेक्षित है| आप सरीखे विजिटर के स्नेह और सुझाव से हम इस साईट में निरंतर सुधार कर रहे है और हमें विश्वास है की आगे के समयों में हम आपको और भी बेहतर सुविधा दे पाएंगें| लेकिन इस हेतु आपसे अनुरोध है की आप हमारे कांटेक्ट अस पेज के माध्यम से अपना विचार एवं अपना बहुमूल्य सुझाव हम तक जरुर प्रेषित करें| इस आर्टिकल को पढ़ने तथा अवेयर माय इंडिया साईट पर विजिट करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|

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