मूल अधिकार या मौलिक अधिकार किसे कहते है? हिंदी में विस्तृत व्याख्या

संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित बुनियादी अधिकार मूल अधिकार या मौलिक अधिकार का सबसे सटीक वर्णन है| लगभग अधिकतर लोकतांत्रिक देश अपने नागरिको को कुछ बुनियादी अधिकार प्रदान करते है एवं उन्हें सुरक्षित बनाने हेतु संविधान में सूचीबद्ध करते है|अधिकारों को सुरक्षित करने से तात्पर्य है की उन्हें राज्य द्वारा भी खत्म या सीमित न किया जा सकें| भारतीय संदर्भ में, आजादी की संघर्ष में ही हमारे नेताओं ने बुनियादी अधिकारों के महत्व को पहचाना था| और तब 1928 में ही मोतीलाल नेहरु समीति ने ब्रिटिश शासकों से अधिकारों की घोषणापत्र की मांग उठाई| भारत के स्वतंत्र होने के बाद जब स्वतंत्र भारत के नेता संविधान तैयार कर रहे थे तब इन बुनियादी अधिकारों को संविधान में शामिल करने को लेकर पूर्ण सहमती थी| इस तरह भारतीय संविधान के भाग तीन में मूलभूत अधिकारों को शामिल किया गया| इन्हें मूल अधिकार या मौलिक अधिकार कहा गया| हम इस पोस्ट में मूल अधिकार किसे कहते है की विस्तृत वर्णन करेंगे| आइये आर्टिकल की शुरुआत करते है| मौलिक अधिकार किसे कहते है हिंदी में व्याख्या..

मूल अधिकार या मौलिक अधिकार किसे कहते है?

मौलिक अधिकार किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार से अलग है | किसी व्यक्ति को अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त हो सकते है| इनमें से कुछ अधिकार अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भी हो सकते है, कुछ मानव के रूप में प्राप्त हो सकते है, कुछ इस सृष्टि के प्राणी होने के नाते प्राप्त हो सकते है, परन्तु मौलिक अधिकार इससे अलग है| अन्य अधिकार इस बात की सुनिश्चितता नही देते है की यह व्यक्ति को अनिवार्य रूप से प्राप्त होगा|

अगर किसी व्यक्ति को अन्य अधिकार नहीं भी प्राप्त होता है तो इस बात की गारंटी नही है की व्यक्ति उसके लिए उपचार प्राप्त कर सकता है या अपनी शिकायत कर सकता है| परन्तु मौलिक अधिकार की स्थिति में व्यक्ति अपने मूल अधिकार की पूर्ति न होने पर गारंटी उपचार प्राप्त कर सकता है| उसे संविधान द्वारा इस बात की गारंटी दी जाती है की सरकार का कोई भी अंग उसके इस अधिकार की अवमानना नही कर सकता है|

इसी प्रकार मौलिक अधिकार व्यक्ति को प्राप्त समस्त क़ानूनी अधिकार से अलग है | कानून द्वारा नागरिकों को जो अधिकार प्राप्त होते है उसे कानून बनाकर ही समाप्त किया जा सकता है अथवा बदला जा सकता है| यह उल्लेखनीय है की कानून बनाने का कार्य विधायिका का होता है और अधिकांश स्थितियों में विधायिका सरकार के पक्ष में होती है| इससे सरकार अपनी इच्छानुसार कानून और क़ानूनी अधिकार में फेरबदल कर सकती है| इस तरह विधायिका भी अपने अनुसार कानून बनाकर क़ानूनी अधिकार में परिवर्तन कर सकती है|

इसके विपरीत मौलिक अधिकार के अंतर्गत प्रदान किये गये अधिकार विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि के प्रभाव से सुरक्षित होती है| इसमें फेर-बदल करने के लिए संविधान में संसोधन करने की आवश्यकता होती है| केशवानन्द भारती मामलें में माननीय उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया की इन संसोधनों में संविधान की मूल ढांचा तथा आत्मा में संसोधन नही किया जा सकता| यह प्रावधान मौलिक अधिकार को अन्य क़ानूनी अधिकार से अलग करती है|

लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है की मौलिक अधिकार अपरिवर्तनीय है| मौलिक अधिकार को निरंकुश नही बनाया गया है | इनमें से प्रत्येक अधिकार के प्रयोग पर सरकार कुछ प्रतिबन्ध लगा सकती है| अतः हम ऐसा नहीं कह सकते है की मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त ऐसे अधिकार है जिन पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता है|

मूल अधिकार या मौलिक अधिकार किसे कहते है

उदाहरण के तौर पर देखें तो मूल अधिकार के अंतर्गत दिए गये ‘भाषण एवं अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता’ पर कानून व्यवस्था, शांति व नैतिकता के आधार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है| ‘सभा व सम्मलेन करने की स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार के प्रयोग की यह शर्त है की वह शांतिपूर्ण तथा बिना हथियारों के हो| सरकार किसी क्षेत्र में पांच या पांच से अधि लोगों की सभा पर प्रतिबन्ध लगा सकती है|

मौलिक अधिकार पर प्रतिबन्ध किस हद तक लगाया जा सकता है अथवा क्या यह समाप्त किया जा सकता है? इस प्रश्न पर लम्बी क़ानूनी लड़ाई हो चुकी है| विदित है की भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार की ही तरह नीति-निर्देशक तत्व की भी चर्चा मिलती है लेकिन राज्य के नीति-निर्देशक तत्व को बाध्यकारी नही बनाया गया है| राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से तात्पर्य है की संविधान द्वारा राज्यों को दिया जाने वाला दायित्व| यह दायित्व बाध्यकारी नहीं बल्कि नैतिक है| अर्थात राज्य द्वारा इनके पालन न किये जाने की स्थिति में व्यक्ति न्यायालय नहीं जा सकता है और न ही न्यायलय इस सम्बन्ध में बाध्यकारी आदेश जारी कर सकता है|

विवादित मामला नीति निर्देशक बनाम मौलिक अधिकार का था| मामलें के अनुसार राज्य के नीति-निर्देशक तत्व में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की बात कही गई थी जबकि नागरिकों के मौलिक अधिकार में सम्पति का अधिकार रखा गया था| दोनों अपने आप में विरोधाभाषी था| जब सरकार ने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए जमींदारो की सम्पति जप्त करनी चाही तो इसे न्यायालय में मौलिक अधिकार के हनन के रूप में चुनौती दी गई|

फलस्वरूप एक लम्बी क़ानूनी लड़ाई हुई| सरकार का पक्ष था की नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए मौलिक अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है| इसके पीछे धारणा थी की लोक कल्याण के मार्ग में अधिकार बाधक है| प्रतिवादी के अनुसार मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण और पावन है की नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए भी उन्हें प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता|

इस विवाद ने एक और बड़ी विवाद को जन्म दे दिया| यह जटिल विवाद संविधान के संसोधन से संबंधित था| सरकार का मत था की संसद संविधान के किसी भी अंश या प्रावधान में संसोधन कर सकती है जबकि न्यायपालिका का कहना था की संसद कोई ऐसा संसोधन कार्य नहीं कर सकती है जो मूल अधिकार का उलंघन करता हो|

यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती मामलें में दिए गये एक महत्वपूर्ण निर्णय से समाप्त हुआ| इसमें न्यायालय ने कहा की संविधान की कुछ ‘मूल ढांचागत’ विशेषताएँ है संसद इनमें कोई भी संसोधन-परिवर्तन नहीं कर सकती है|

जमींदारी उन्मूलन कानून बनाम सम्पति के अधिकार में यह सोचकर की समाजिक हित एवं आवश्यकताएँ वैयक्तिक हित से ऊपर है, सरकार को नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने हेतु सम्पत्ति के अधिकार के लिए संविधान संसोधन को मंजूरी दी गई| इस तरह सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकार की सूची से निकालकर क़ानूनी अधिकार बना दिया गया| इससे स्पष्ट है की मौलिक अधिकार ऐसे अधिकार नहीं है जिन पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता|

मौलिक अधिकार के बारे में कहा जा सकता है की ये ऐसे अधिकार है, जिन्हें संविधान प्रदान करता है, उनका व्यक्ति विशेष, संस्था या स्वयं राज्य द्वारा भी हनन नही किया जा सकता| इन अधिकारों के पूर्ति न होने की स्थिति में व्यक्ति संविधानिक उपचार प्राप्त कर सकता है| भारतीय संदर्भ में इसके लिए उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय को पांच प्रकार के प्रादेश या रिट- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध आदेश, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण जारी करने की शक्ति प्राप्त है|  मूल अधिकार को विशेष स्थिति यथा-लोक कल्याण, संकट आदि की स्थिति में सिमित समय के लिए प्रतिबंधित या खत्म किया जा सकता है| इसके आलावा मूल ढांचे में संसोधन के अतिरिक्त लोककल्याण के लिए विधायिका इसमें संसोधन कर सकती है|

पचास-साठ वर्षों में मौलिक अधिकार के अंतर्गत प्राप्त अधिकार के अंतर्गत प्राप्त अधिकार में काफी परिवर्तन, विविधता एवं चर्चा आदि देखने को मिली है| इस दरम्यान न्यायपालिका द्वारा मौलिक अधिकार में अंतर्निहित बातों को स्पष्ट किया गया| विशेष रूप से जीवन के अधिकार में अंतर्निहित बातों को अनेक दृष्टिकोण से परिभाषित किया गया|

दक्षिण अफ्रीका का संविधान संभवतः अपने नागरिकों को सर्वाधिक विस्तृत अधिकार प्रदान करता है| वहां के नागरिकों को प्राप्त अधिकारों को ‘अधिकारों का घोषणा पत्र’ कहा जाता है|  इसमें कई ऐसे अधिकार है जो स्पस्ट शब्दों में परिभाषित किये गये है लेकिन भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार में इसे अंतर्निहित माना जाता है| जैसे की- स्वास्थ्यप्रद पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण का अधिकार|

इसके बाबजूद हमारे संविधान द्वारा प्रदान किये गये मूल अधिकार के संरक्षण तथा उपचार के प्रावधान इसे विशिष्ट, महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक व्यापक बनाते है एवं हमें हर एक उचित कारण प्रदान करते है की हम अपने संविधान, अपने देश तथा अपने मौलिक अधिकार पर गर्व कर सकें|

भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार या हमारा मूल अधिकार कौन-कौन से है जानने और पढने के लिए क्लिक करें- हमारा मौलिक अधिकार

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