18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था या 18th century India’s economic system इतिहासकारों और विद्यार्थियों के लिए काफी चर्चा का विषय रहा है| तत्कालिक भारत आर्थिक रूप से सम्पन्न था या विपन्न इस बात को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहा है| ज्यादातर विद्वान का मानना है की आर्थिक जीवन स्थिर या प्रगतिशील नहीं था तथापि इस बात से इंकार नही किया जा सकता है की उस समय का भारत औपनिवेशिक काल से बेहतर अवस्था में था| विभिन्न पक्षों एवं व्यवस्था की समझ हासिल करने के लिए 18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था का विवेचन विश्लेषण प्रासंगिक होगा|  18th century India’s economic system in hindi or 18th sadi ke bharat ki aarthik vyvstha hindi me.

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था


18वीं सदी का भारत काफी उथल-पुथल का समय रहा है| इसे लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहा है| इतिहासकारों के बीच 18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था को लेकर होने वाले मतभेद की चर्चा हम इसी पोस्ट में आगे करेंगें लेकिन आइये पहलें 18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था पर दृष्टिपात करें|

समाज की आर्थिक स्थिति

उन दिनों का भारत विषमताओं का देश हो गया था| अत्यंत दरिद्रता तथा अत्यंत समृद्धि साथ-साथ ही पाई जाती थी| फिर भी तात्कलिक जीवन को औपनिवेशिक शासन काल से बुरा नही कहा जा सकता|

कृषि

कृषि तकनीक पिछड़ी एवं जड़वत थी| किसान कठिन परिश्रम करता था जिससे औसत उत्पादन हो जाती थी, लेकिन इसका लाभ किसानों को नही मिल पाता था| किसानों से लगान के रूप में अधिकतम रकम की उगाही की जाती थी|

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गाँव की दशा एवं व्यापार

यद्यपि गाँव बहुत हद तक स्वावलंबी थे तथापि बड़े पैमाने पर आंतरिक एवं बाह्य व्यापार किया जाता था| गाँवों के स्वावलंबी होने के कारण तात्कालिक भारत में आयात कम होता था तथा निर्यात अधिक होता था| भारत उस समय बहुमूल्य धातुओं के खजाने के नाम से जाना जाता था| 18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था को समझने के लिए उस समय के आयात-निर्यात को समझना आवश्यक होगा|

आयात – निर्यात

इलाके आयात
फारस की खाड़ी मोती, कच्चा रेशम, ऊन, खजूर, मेवा, गुलाब जल
अरब कहवा, सोना दवाएं, शहद
चीन चाय, चीनी मिट्टी, रेशम
तिब्बत सोना, कस्तूरी, ऊनी कपड़ा
सिंगापूर टिन
इंडोनेशिया मसाले, इत्र, शराब, चीनी
अफ्रीका हाथी दांत, दवाएं
यूरो ऊनी कपड़ा, तांबा, लोहा, सीसा, कागज आदि

निर्यात

सूती वस्त्र, कच्चा रेशम, रेशमी कपड़े, लोहे का सामान, नील, शोरा, अफीम, चावल, गेहूं, चीनी, काली मिर्च, अन्य मसालें, रत्न, औषधि आदि का निर्यात किया जाता था|

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शहर एवं शहरी उद्योग की स्थिति

शहर एवं शहरी उद्योगों को भी राजनितिक उथल-पुथल का बुरा प्रभाव झेलना पड़ा| अनेक समृद्ध शहरों एवं उद्योग के केंद्र को न केवल लुटा गया बल्कि नष्ट कर दिया गया| उदाहरण के लिए दिल्ली को नादिर शाह द्वारा लाहौर दिल्ली मथुरा को अहमद शाह अब्दाली द्वारा, आगरा को जाटो द्वारा, सूरत गुजरात और दक्कन को मराठो द्वारा तथा सरहिंद को सिक्खों द्वारा लूट लिया गया|

अपने संरक्षकों की धन-दौलत में कमी से दस्तकारों आदि को खूब क्षति पहुंची| इसमें भी रही-सही कसर को आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के गिरावट ने पूरा कर दिया| आर्थिक जन-जीवन पूरा तबाह हो गया था| दिल्ली एवं आगरा जैसे नगरों का पतन होने लगा|

हालाँकि देश के कुछ अन्य भागों में यूरोपीय कम्पनियों के आर्थिक क्रियाकलाप से कुछ उद्योगों की बेहतर अवस्था थी| इसी तरह नए सरदारों तथा दरबारों के बनने के कारण कुछ नए नगरों का उद्भव हुआ| इसने पुराने शहरों के नष्ट होने के दर्द की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश की| ऐसे नए शहरों के रूप में फैजाबाद, लखनऊ, वाराणसी, पटना जैसे नगरों को देखा जा सकता है|

ऐसे में व्यापक अस्थिरता होने के बाबजूद भारत आर्थिक दृष्टि से व्यापक विनिर्माण का देश बना रहा| उस समय चीनी, जुट, रंग सामग्री, खनिज, हथियार, धातु के बर्तन, शोरा और तेलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था| तात्कालिक समय का भारत विनिर्माण के लिए प्रतिष्ठा प्राप्त करता रहा था|

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18वीं सदी के भारत में कपड़ा उद्योग के महत्वपूर्ण केंद्र

वर्तमान राज्य स्थान
बंगाल ढाका और मुर्शिदाबाद
बिहार पटना
गुजरात सूरत, अहमदाबाद, भड़ौच
मध्य प्रदेश चंदेरी
महाराष्ट्र बुरहानपुर
उत्तर प्रदेश जौनपुर, बनारस, लखनऊ, आगरा
पंजाब मुल्तान और लाहौर
आन्ध्र प्रदेश मछली पट्टनम, औरंगाबाद, चिककोल, विशाखापत्तनम,
कर्नाटक बंगलौर
तमिलनाडु कोयमबंतूर और मदुरै

कश्मीर ऊनी वस्त्र का केंद्र था जबकि महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, बंगाल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित हुआ|

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था को लेकर इतिहासकारों में विवाद


18वीं सदी का भारत काफी उथल-पुथल का समय रहा है| यही कारण है की कुछ इतिहासकार इसे अंधकार युग की भी संज्ञा देने से परहेज नहीं करते है| वही कुछ विद्वान इसे अन्धकार युग नहीं मानते है| इस सन्दर्भ में तत्कालिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक पहलुओं एवं व्यवस्था का विद्वानों द्वारा विचार-विमर्श व शोध किया जाता रहा है| इसमें आर्थिक व्यवस्था भी अपवाद नही रहा है और इस पर भी काफी विचार-विमर्श किया गया है|

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था

प्रथम प्रकार के इतिहासकारों का पक्ष

कुछ विद्वानों का कहना है की 18वीं सदी का भारत आर्थिक प्रगति नहीं कर सका| ऐसे इतिहासकारों का मानना है की राज्य की बढती राजस्व मांगें, अफसरों के अत्याचार, सामंतों, लगान के ठेकेदारों और जमींदारों की धन लिप्सा, लूट-खसोट, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, अनगिनत दुह्सह्सिकों के द्वारा लूट-मार से जनजीवन बिलकुल दयनीय हो गया था|

दुसरे प्रकार के इतिहासकारों का पक्ष

वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वानों का कहना है की राजनितिक परिवर्तनों तथा आंतरिक व्यापार संबंधी झगड़ो को काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है| विदेश व्यापार पर इसका असर भी जटिल और अलग-अलग तरह का था| जहाँ समुद्री व्यापार का विस्तार हुआ वहीँ फारस और अफगानिस्तान के रास्ते होने वाला व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया| इसी तरह जहाँ एक ओर देश के एक हिस्से में आर्थिक स्थिति में गिरावट आई और व्यापार अस्त व्यस्त हो गया वहीँ दूसरी ओर कुछ हिस्से में व्यापार, कृषि तथा दस्तकारी का उत्पादन फलता-फूलता रहा|

निष्कर्ष
18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था की जांच करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है की तत्कालिक भारत में मूलभूत आर्थिक ठहराव नजर नही आता है| हालाँकि अधिक हानि नहीं हुई, लेकिन प्रश्न अवनीति या उन्नति का नहीं बल्कि मूलभूत आर्थिक ठहराव का है|18वीं सदी में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की गुंजाइश थी लेकिन 17वीं सदी के मुकाबलें आर्थिक गतिविधियां में कोई अधिक सुगबुगाहट अथवा उल्लास नजर नहीं आता है|

18वीं सदी के भारत की आर्थिक व्यवस्था में दस्तकारी और कृषि उत्पादन में निश्चित तौर पर ह्रास की प्रवृति नजर आती है लेकिन इसकी दशा औपनिवेशिक काल के भारत की दशा से ज्यादा खराब नहीं थी|

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