भौगोलिक संकेत या जीआई टैग क्या है?

भौगोलिक संकेत या Geographical Indication या गई टैग – GI Tag हमारी समृद्ध संस्कृति और सामूहिक बौद्धिक विरासत का हिस्सा हैं|  यह हमारे किसानों, बुनकरों, दस्तकारों, हस्तशिल्पियों की आय के साधन के साथ ही देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| हम इस पोस्ट में इसके और इसके सभी पहलुओं के बारे में सरल हिंदी भाषा में विस्तार पूर्वक बात करेंगें| Bhaugolik Sanket or Geographical indication or GI Tag ki samjh hindi me.

भौगोलिक संकेत या Geographical Indication

भौगोलिक संकेत – Geographical indication – GI Tag


हम इस आर्टिकल में देखेंगें की भौगोलिक संकेत क्या है या जीआई टैग (गई टैग – GI Tag) क्या है? किस-किस उत्पाद को भौगोलिक संकेत list में शामिल किया गया है? भौगोलिक संकेत या गई टैग -GI Tag प्राप्त करने के लाभ क्या है इसका आम लोगो के साथ-साथ भारत देश के विकास के लिए क्या महत्व है? हम यह भी देखेंगें की जीआई एक्ट क्या है? Geographical indication के सामने चुनौतियां क्या है और आगे के लिए उचित कदम क्या हो सकता है? आइये चर्चा की शुरुआत करते है|

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भौगोलिक संकेत क्या है?


Bhaugolik Sanket Kya Hai hindi me Or What is Geographical indication in Hindi.

सामान्य रूप से भौगोलिक संकेत या Geographical Indication का अर्थ निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में कृषि, प्राकृतिक या तैयार किए गए उत्पाद से है| किसी उत्पाद को GI TAG या गई टैग प्राप्त करने के लिए उसका संबंधित क्षेत्र में उत्पादन या निर्माण या प्रसंस्करण होना आवश्यक है|

भौगोलिक संकेत या भौगोलिक नाम एक विलक्षणता प्रदान करता है और गुणवत्ता का आश्वासन देता है। पंजीकृत भारतीय भौगोलिक संकेतों के कुछ उदाहरण हैं – दार्जिलिंग-चाय, तिरुपति-लड्डू, कांगड़ा-पेंटिंग, नागपुर-संतरा, कश्मीर-पाश्मीना आदि।

और भी सरल शब्दों में समझें तो जीआई टैग या भौगोलिक संकेत एक प्रकार का मुहर है जो किसी भी उत्पाद के लिए प्रदान किया जाता है| इस मुहर के प्राप्त होने के जाने के बाद पूरी दुनिया में उस उत्पाद को महत्व प्राप्त हो जाता है साथ ही उस क्षेत्र को सामूहिक रूप से इसके उत्पादन का एकाधिकार प्राप्त हो जाता है| लेकिन इसके लिए शर्त है की उस उत्पाद का उत्पादन या प्रोसेसिंग उसी क्षेत्र में होना चाहिए जहाँ के लिए गई टैग (GI Tag) लिया जाना है|

भौगोलिक संकेत न केवल हमारी समृद्ध संस्कृति और सामूहिक बौद्धिक विरासत का हिस्सा हैं बल्कि हमारे किसानों, बुनकरों, दस्तकारों, हस्तशिल्पियों की आय के साधन भी है। भारत सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के अनुरूप भौगोलिक संकेत का संवर्धन करना और इसकी सुरक्षा करना सरकार ने अपनी जिम्मेदारी समझी है।

भारत में सबसे पहलें 2004 में दार्जलिंग टी को गई टैग- GI Tag दिया गया|  इसके बाद से एक के बाद एक एप्लीकेशन आते गये और मानकों के आधार पर उन्हें गई टैग प्रदान किया जाता रहा| उनमें से कई आवेदन को मानक पूरा नही कर पाने की स्थिति में भौगोलिक संकेत सूची में स्थान नहीं दिया गया| यहाँ यह वर्णन करना आवश्यक होगा की भौगोलिक संकेत का पंजीकरण 10 वर्षो तक के लिए ही होता है उसके बाद इसका नवीकरण करवाया जाना आवश्यक है अन्यथा यह समाप्त हो जाता है| आइये भौगोलिक संकेत list या नवीनतम गई टैग list को समझते है|

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भारत में भौगोलिक संकेत सूची में शामिल उत्पाद

GI Tag list 2018 in hindi. 10 सितम्बर 2018 तक GI Tag-गई टैग के लिए अनुरोध की गई आवेदनों की कुल संख्या 624 है| नीचे दिए गये लिंक के माध्यम से इन सूचियों को देखा जा सकता है|

GI Tag से उत्पादों का संरक्षण

आइये अब समझते है की भौगोलिक संकेत या GI Tag मिलने के बाद किसी उत्पाद को कैसे सुरक्षा प्राप्त होती है? भौगोलिक संकेत उत्पाद को एक विलक्षणता प्रदान करता है और साथ ही गुणवत्ता का भी आश्वासन देता है। किसी उत्पाद को गई टैग मिल जाने से कैसे सुरक्षा प्राप्त होती को निम्न उदाहरण से समझा जा सकता है|

भारत में सबसे पहले दार्जिलिंग टी को GI TAG प्रदान किया गया| इसके बाद इस क्षेत्र से बाहर उत्पादन किये गये उत्पाद पर दार्जिलिंग टी का टैग नही लगाया जा सकता| इसके आलावा अगर उत्पाद को गई टैग के मानकों के आधार पर नहीं बनाया गया है तो भी उत्पाद पर दार्जिलिंग टी का टैग नही लगाया जा सकता| इस तरह कहा जा सकता है की जिस समूह ने इस उत्पाद के लिए जीआई टैग प्राप्त किया है उसे संबंधित उत्पाद के सरंक्षण का लाभ मिलता है।

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जीआई टैग के लाभ


आइये अब समझते है की भौगोलिक संकेत या जीआई टैग -GI Tag प्राप्त करने के लाभ क्या है, इसका आम लोगो के साथ-साथ भारत देश के विकास के लिए क्या महत्व है?

भौगोलिक संकेत या Geographical Indication

GI Tag के सामान्य लाभ

  • भौगोलिक संकेतक उत्पाद के लिये कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
  • अन्य लोगों द्वारा किसी पंजीकृत भौगोलिक संकेतक के अनधिकृत प्रयोग को रोकता है।
  • यह संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित वस्तुओं के उत्पादकों की आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है।

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भारत के विकास में GI Tag का महत्व

  • ग्रास रूट लेवल पर विकास- इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा मिलने के साथ ही गरीब किसानों और कामगारों को संरक्षण भी प्राप्त होगा| इससे सबसे निचले स्तर के लोग भी लाभान्वित होंगें| जबकि ज्यादातर अन्य पहलों में  विकास का लाभ ग्रास रूट लेवल पर नहीं आ पाता|
  • कृषक और कृषि की दशा में सुधार- आज कृषक और कृषि दोनों ही संवेदनशील अवस्था में खड़े है| किसानों की आत्महत्या से लेकर उनकी दयनीय आर्थिक स्थिति अपने आप में सिक्के के अंधेरे पहलुओं को प्रदर्शित करते है| ऐसे में जीआई टैग स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देकर एक आशा बहाल कर सकता है| इससे कृषक और कृषि दोनों का विकास संभव है|
  • आदिवासी क्षेत्रों का विकास- भौगोलिक संकेत आदिवासियों के परम्परागत विशेषज्ञताओं का संरक्षण करते हुए आदिवासी समुदाय के उत्थान में सहायक साबित हो सकता है| साथ ही
  • इससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी हो सकेगा|
  • Geographical indication गुणवत्तापूर्ण उत्पाद का उत्पादन सुनिश्चित करेगा इससे स्थानीय उत्पादों की घरेलू बाजार के साथ ही अंतराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतों में वृद्धि होगी| इस तरह निर्यात में भी वृद्धि होगी|

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जीआई एक्ट, 1999


  • जीआई एक्ट को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ़ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटक्शन) एक्ट, 1999 या Geographical Indication of Goods (Registration and protection) act, 1999 भी कहते है|
  • भारत में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सदस्य होने के नाते, ‘ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ़ गुड्स (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999’ को लागू किया गया| यह 15 सितंबर 2003 से लागू हुआ|
  • इस अधिनियम को WTO के TRIPS- Trade related intellectual property rights समझौते का पालन करने के लिए अधिनियमित किया गया|
  • औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिए पेरिस सम्मेलन के लेख 1 (2) और 10 के तहत, भौगोलिक संकेत IPR के तत्व के रूप में भी शामिल हैं।
  • इस अधिनियम को Controller General of Parents, Design & Trade Marks द्वारा प्रशासित किया जाता है| यह जीआई टैग भी प्रदान करता है|

gi tag admi

 

 

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भौगोलिक संकेत या GI Tag से संबंधित चुनौतियां

अपने आप में ढेरों महत्व धारण करने के बाबजूद इससे संबंधित कई चुनौतियाँ है जिसे निम्न बिन्दुओं के माध्यम से देखा जा सकता है-

  • दस्तावेजी साक्ष्यों पर निर्भरता- भारत में भौगोलिक संकेत सूची में नाम दर्ज करने का कार्य Geographical Indication Registry करता है| और इसके लिए विभिन्न मानदंडों में से एक मानदंड यह है की किसी उत्पाद को गई टैग के रूप में दर्ज करने के लिए उसके उत्पत्ति से संबंधित साक्ष्य का होना अनिवार्य है| जबकि भारत के कई हिस्सों में विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में उत्पत्ति से संबंधित साक्ष्य लिखित रूप से उपलब्ध नही है, वह केवल मौखिक रूप में ही है| ऐसे में गई टैग प्राप्त करने के लिए उत्पत्ति से संबंधित साक्ष्यों को एकत्रित कर पाना अत्यधिक चुनातिपूर्ण है| ऐसे में बहुत से क्षेत्र और लोग इसके लाभ से वंचित रह जाते है और उन तक लाभ को पहुँचाना एक प्रमुख चुनौती है|
  • उत्पादों की सिमित सुरक्षा- गई टैग अधिनियम ज्ञान या उत्पादन की तकनीक के बदले केवल नाम की ही सुरक्षा करता है| ऐसे में उसी उत्पाद को दुसरे नाम से पुनः उत्पादित किया जा सकता है| इससे अधिनियम वास्तविक क्षेत्र एवं लोग को सुरक्षा नहीं दे पाता है और अधिनियम की उद्देश्य ही प्रभावहीन हो जाता है|
  • नियमों की अस्पष्टता- टैग अधिनियम असली उत्पादक या निर्माता और फुटकर विक्रेता तथा डीलर के मध्य अंतर स्पष्ट नही कर पाता है| इससे कई जगहों पर भौगोलिक संकेत या GI Tag का वास्तविक लाभ उत्पादक या निर्माता तक नहीं पहुँच पाता है|
  • पर्याप्त आकलन की कमी- गई टैग के लिए आवेदन करने वाले समूह द्वारा घरेलु और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भौगोलिक संकेतक उत्पादों की वाणिज्यिक सम्भावना के बारे में उचित आंकलन नही किया जाता है| इसके आलावा उत्पादों के पंजीकरण से इसकी आपूर्ति श्रृंखला में सम्मिलित समुदायों पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का आकलन नही किया जाता है| इससे वास्तविक रूप से गई टैग का लाभ नहीं प्राप्त हो पाता है|

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आगे के लिए उचित कदम


आइये अब बात करते है सही मायने में जीआई टैग या Geographical indication का लाभ प्राप्त करने के लिए उचित कदम क्या हो सकता है| भौगोलिक संकेत हेतु आगे के लिए उपयुक्त कदम को निम्न बिन्दुओं के माध्यम से देखा जा सकता है|

  • नियमों में लचीलापन-  गई टैग के वास्तविक लाभ इनके लाभार्थियों को प्राप्त कराने हेतु नियमों में  संसोधन किया जाना आवश्यक प्रतीत हो रहा है| उदाहरण के लिए
    • विशेष मामलें में gi रजिस्ट्री के लिए उत्पत्ति के साक्ष्य की स्थापना हेतु शब्द व्युत्पत्ति पर भी विचार किया जा सकता है|
    • नियमों के अनुसार किसी भी उत्पाद को जीआई टैग तभी दिया जाएगा जब उस उत्पाद और क्षेत्र विशेष के अंतर्संबंध को प्रमाणित करने वाला साक्ष्य पेश किया जाए। इसमें समस्या प्रमाणीकरण की नहीं बल्कि स्थान और उत्पाद के अंतर्संबंध के सबूत के तौर पर डॉक्यूमेंट्री साक्ष्य पेश करने की है। ज्यादातर साक्ष्य, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रो में, मौखिक होते है| इस संबंध में थोड़ा लचीलापन सही साबित हो सकता है|
  • उत्पाद की वैधता स्थापित करने के लिए स्पष्ट भौगोलिक सीमाओं को परिभाषित किया जाना चाहिए|
  • उपभोक्ताओं को गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद और उत्पादकों को सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान करने के लिए सभी हितधारकों के मध्य संचार का उचित चैनल विकसित करने की आवश्यकता है|
इस तरह आपने भारत में भौगोलिक संकेत या जीआई टैग या Geographical indication के बारे में जाना| अगर आपका इससे संबंधित कोई प्रश्न या सुझाव हो तो कमेंट जरुर करें| आशा है की हमारे अन्य आर्टिकल की तरह ही आप इस आर्टिकल से भी लाभान्वित होंगे| हम इस बात को महसूस कर रहे है की आपके और बेहतर सुविधा के लिए इस साईट में कई सुधार किया जाना अपेक्षित है| आप सरीखे विजिटर के स्नेह और सुझाव से हम इस साईट में निरंतर सुधार कर रहे है और हमें विश्वास है की आगे के समयों में हम आपको और भी बेहतर सुविधा दे पाएंगें| लेकिन इस हेतु आपसे अनुरोध है की आप हमारे कांटेक्ट अस पेज के माध्यम से अपना विचार एवं अपना बहुमूल्य सुझाव हम तक जरुर प्रेषित करें| इस आर्टिकल को पढ़ने तथा अवेयर माय इंडिया साईट पर विजिट करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|
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