वाताग्र की उत्पत्ति कैसे होती है, इसके प्रकार एवं मौसमी प्रभावों की हिंदी में चर्चा

वाताग्र पृथ्वी तल पर निम्न वायुदाब के क्षेत्र में विकसित एक विशिष्ट वायुमंडलीय परिघटना है. इसकी उत्पत्ति दो भिन्न प्रकृति की वायुराशियों के विपरीत दिशा से आकर अभिशरण करने से होती है. इस आर्टिकल में आप वाताग्र के बारे में विभिन्न बातों को विस्तार पूर्वक पढेंगें. जैसे की वाताग्र Front क्या है. वाताग्र की उत्पत्ति कैसे होती है. वाताग्र के प्रकार – स्थायी, संरोधित, शीत व उष्ण वाताग्र क्या है तथा इसके मौसमी प्रभाव क्या होते है. front in hindi.

वाताग्र के प्रकार

वाताग्र क्या है


वाताग्र निम्न वायु दाब LP के क्षेत्र में विकसित होने वाली एक विशिष्ट तरह की वायुमंडलीय परिघटना है. जब दो विपरीत प्रकृति की वायुराशी विपरीत दिशा से आकर आपस में मिलती है तब वाताग्र निर्माण की दशा विकसित होती है. वाताग्र निर्माण के आदर्श दशा के लिए एक वायुराशी ठंडी, शुष्क एवं भारी तथा दूसरी वायुराशी गर्म, हल्की एवं आर्द्र होनी चाहिए.

वाताग्र एक संक्रमण क्षेत्र है जिसमें क्षैतिज एवं लम्बवत विस्तार पाया जाता है. यह एक प्रकार की ढलुवा सीमा सतह होती है जिसके सहारे विपरीत दिशा से आने वाली वायु के गुणों में मिश्रण प्रारंभ होता है. वाताग्रों के सहारे वायु में उर्ध्वाधर (उपर की ओर ) प्रवाह विकसित होता है. इससे मौसमी अस्थिरता उत्पन्न होती है.

वाताग्र क्या है

वाताग्रों की उत्पत्ति या विकास


वाताग्रों की उत्पत्ति आदर्श रूप में जलीय सतह पर उपध्रुवीय प्रदेश में होती है. यहाँ ध्रुवीय ठंडी अपर पछुआ गर्म वायुराशियों में अभिशरण होता है. यहाँ हजारों किलोमीटर तक वाताग्री क्षेत्र पाए जाते है. वताग्रों की निर्माण की प्रक्रिया को ही वाताग्र जनन कहते है.

उपध्रुवीय प्रदेश में ध्रुवीय वाताग्र का विकास होता है. इसी वाताग्र के सहारे विभिन्न प्रकार के वताग्रों की उत्पत्ति होती है.

उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी गर्म व्यापारिक पवनों के मिलने से वाताग्र निर्माण की दशा विकसित होती है. लेकिन वहां दोनों वायुराशी (उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें और दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें) की भौतिक प्रकृति समान होने के कारण वताग्र विकसित नहीं हो पाती है. इसकी जगह ITCZ का निर्माण होता है तथा विषुवतीय प्रदेश में विषुवतीय पछुआ पवन के चलने से डोलड्रम (शांत क्षेत्र) का विकास होता है.

आर्कटिक क्षेत्र में भी महाद्वीपीय ध्रुवीय और सागरीय ध्रुवीय वयुराशियों के अभिशरण से सीमाग्र निर्माण की दशा विकसित होती है. इसे आर्कटिक वाताग्री प्रदेश कहते है. लेकिन यहाँ भी दोनों वयुराशियों के तापमान में अधिक अंतर नहीं होने के कारण वताग्रों का अधिक विकास नहीं हो पाता है.

इस तरह कहा जा सकता है की उपध्रुवीय निम्न वायुदाब के क्षेत्र में भी वताग्रों की उत्पत्ति आदर्श रूप में होती है. इसकी उत्पत्ति के क्रम में ही वाताग्र के विभिन्न प्रकार का भी विकास होता है.

वाताग्र के प्रकार


वाताग्र के प्रकार हिंदी में. उपध्रुवीय क्षेत्र में विकसित होने वाले वाताग्र को ही उनके विकास की प्रक्रिया के आधार पर चार प्रकारों में बांटकर देखा जा सकता है. (क.) स्थायी वाताग्र (ख.) शीत वाताग्र (ग.) उष्ण वाताग्र (घ.) संरोधित वाताग्र

स्थायी वाताग्र

उपध्रुवीय प्रदेश में प्रारम्भिक स्थिति में जब ठंडी एवं गर्म वायुराशियाँ समानांतर एवं विपरीत प्रवाहित होने लगती है तब विकसित front को स्थायी वाताग्र कहा जाता है. इसके सहारे ही क्रमशः अन्य front की उत्पत्ति होती है.इस दशा में मौसम लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है. कई दिनों तक हल्की बूंदा-बूंदी होती रहती है.

शीत व उष्ण वाताग्र


ध्रुवीय वाताग्रों के सहारे इसके ध्रुवीय क्षेत्र की ओर जहाँ ठंडी ध्रुवीय वायु आक्रामक होती है वहां शीत वाताग्र की उत्पत्ति होती है. इसके विपरीत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की ओर जहाँ गर्म पछुआ वायु आक्रामक होती है वहां उष्ण वाताग्र का विकास होता है.

वाताग्र के प्रकार

ध्रुवीय वाताग्र में ठंडी वायु के आक्रामक होने के कारण यह गर्म वायु को तीव्रता से उपर उठा देता है जिससे तीव्र ढाल वाले सीमाग्र का निर्माण होता है. यहाँ मुख्यतः वर्षा कपासी बादलों द्वारा वर्षा होती है. वर्षा अपेक्षाकृत तूफानी मौसम के साथ मुसलाधार होती है, जिससे कम समय में अधिक वर्षा प्राप्त होती है.

इसमें तरित झंझा की भी उत्पत्ति होती है. तीव्र गति के कारण यह हजारों किलोमीटर दूर तक प्रवेश कर जाती है. शीतोष्ण चक्रवात की तूफानी वर्षा शीत वाताग्रों से ही संबंधित है.

ध्रुवीय सीमाग्रों के सहारे ही गर्म वायु के आक्रामक होने की स्थिति में जब यह ठंडी वायु के क्षेत्र में प्रवेश करता है तब ठंडी वायु के उपर धीरे -धीरे चढ़ने लगता है. इस प्रक्रिया से मंद ढाल वाले वाताग्र का विकास होता है.इसे उष्ण वाताग्र कहा जाता है.

उष्ण वाताग्र में मंद ढाल के सहारे बड़े क्षेत्रों में और अपेक्षाकृत अधिक समय तक वर्षा प्राप्त होती है. यहाँ वर्षा मुख्यतः वर्षा स्तरी बादलों से होती है. बादलों का क्षैतिज विस्तार अधिक क्षेत्र में होने के कारण वर्षा उष्ण वाताग्र के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में प्राप्त हो जाता है.

जबकि शीत सिमाग्र में लम्बवत विस्तार वाले बादलों और तीव्र वेग के कारण इसके गुजर जाने से वर्षा नहीं भी प्राप्त हो सकती है. शीत व उष्ण वाताग्रों की नीचे दिए गये चित्र के माध्यम से भी बेहतर समझा जा सकता है.

शीत व उष्ण वाताग्र

संरोधित वाताग्र


शीत वाताग्रों की अधिक गति के कारण जब यह उष्ण वाताग्र से मिल जाता है तब इस स्थिति को संरोध की अवस्था कहा जाता है. इसे समाविष्ट की अवस्था भी कहा जाता है और इससे विकसित वाताग्र को संरोधित वाताग्र कहा जाता है.

संरोधित वाताग्र

संरोधित सीमाग्र, वाताग्रों एवं शीतोष्ण चक्रवात की समाप्ति की पूर्व की दशा है. इसके बाद ही सतह की समस्त गर्म हवाएं उपर उठा ली जाती है. और चारों ओर ठंडी हवाएं प्रवाहित होने लगती है.

इस तरह कहा जा सकता है की वाताग्र एक विशिष्ट वायुमंडलीय दशा है. वाताग्र के प्रकार क्षेत्र विशेष के मौसमी एवं जलवायविक दशाओं को निर्धारित करती है.

Hey, आशा है की वाताग्र के प्रकार सहित सीमाग्र या front के विभिन्न जानकारी से आप लाभान्वित हुए होंगें. अगर इसे समझने में किसी प्रकार की कठिनाई हो अथवा आपका कोई प्रश्न या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करें अथवा कांटेक्ट अस के माध्यम से हमें बताएं. अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरुर करें ताकि अन्य लोग भी इस जानकारी को पा सकें. इस आर्टिकल को पढने के लिए आपको ढ़ेरों धन्यवाद.

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