हमारा वायुमंडल किन चीजों से मिलकर बना है और यह कितनी दूर तक फैला है?

हमारा वायुमंडल पृथ्वी के चारो ओर स्थित गैस, धूलकण एवं जलवाष्प के मिश्रण से विकसित गैसीय आवरण है. इसका निर्माण पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही भौतिक एवं जैविक दशाओं में परिवर्तन और अंतर्क्रिया के परिणाम स्वरूप हुई है. हम इस पोस्ट में इसके बारे में विस्तारपूर्वक बात करेंगें. हम देखेंगें की वायुमंडल की संरचना कैसी है? यह किन तत्वों से मिलकर बना है और कितनी दूर तक फैला है? हम वायुमंडल की संरचना का चित्र भी देखेंगें. हम वायुमंडल की परिभाषा, अर्थ के साथ ही इसके महत्व को भी समझेंगें. इसी क्रम में हम वायुमंडल की विभिन्न परतें को देखेंगें और इन परतों की ऊँचाई और महत्व को भी समझेंगें.

वायुमंडल की संरचना

आप इस पोस्ट को पढने के बाद वायुमंडल से संबंधित निम्न तरह के पश्नों के उत्तर दे पाने की स्थिति में होंगे

  1. वायुमंडल के संघटक तत्वों की विशेषताओं को बताते हुए इसके जैवीय महत्व को समझाएं.
  2. वायुमंडल की संरचना की जटिलता को समझाते हुए विभिन्न परतों की भौतिक विशेषताओं को बताएं.
  3. क्षोभमंडल को मौसमी परिवर्तनों का छत क्यों कहा जाता है?
  4. वायुमंडल की परतें को बताते हुए क्षोभमंडल की ऊंचाई ध्रुवों पर कम और विषुवत रेखा पर अधिक क्यों होती है, को बताएं.

अगर आप Atmosphere से संबंधित ऐसे प्रश्नों का उत्तर सरल रूप में प्राप्त करना चाहते है तो इस आर्टिकल को ध्यान से और पूरा पढ़ें. आइये चर्चा की शुरुआत करते है.

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वायुमंडल


Atmosphere in hindi. हम यहाँ वायुमंडल के बारे में बेसिक बातों को समझते हुए वायुमंडल के संघटक तत्वों के बारे में और वायुमंडल की संरचना के बारे में बात करेंगें. इसी क्रम में हम वायुमंडल की परतें को भी समझेंगें

वायुमंडल क्या है


Vayumandal ki paribhasha, arth, mahtwa hindi me. वायुमंडल की परिभाषा, अर्थ, महत्व हिंदी में. वायुमंडल एक भौतिक संरचना है. आमतौर पर पृथ्वी के चारों ओर की गैस के परत को ही वायुमंडल मान लिया जाता है लेकिन यह सही नहीं है. यथार्थ में यह गैस, धूलकण और जलवाष्प से मिलकर बना है. वायुमंडल की ऊँचाई लगभग 80,000 किलोमीटर तक मानी जाती है (स्ट्रालर के अनुसार). हालाँकि वायुमंडल की ऊँचाई को लेकर विभिन्न विद्वानों में काफी मतभेद रहा है. इसके लिए शोध-अनुसन्धान कार्य जारी है.

वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी से सलंग्न है. गैस, धूलकण और जलवाष्प जैसे संघटक तत्वों की आनुपातिक स्थिति में संतुलन ही वायुमंडल की जैवीय दशा को बनाये रखती है. वायुमंडल की परतें की बात की जाये तो इसके 6 मुख्य परत है –  क्षोभमंडल (Troposphere), समताप मंडल (Stratosphere), मध्यमंडल (Mesosphere), आयनमंडल (Ionosphere), बहिर्मंडल (External atmosphere), चुम्बकीय मंडल (Magnetic Atmosphere) . इनके बारे में विस्तार से चर्चा हम इसी पोस्ट में आगे करेंगें.

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वायुमंडल के संघटक तत्व


Composition of atmosphere in hindi. Or Vayumandal ki sanghtak tatwon ki hindi me puri jankari. हम बात करने जा रहे की हमारा वायुमंडल किन चीजों से मिलकर बना है. वायुमंडल के संघटक तत्व  को समझने के बाद हम इसी पोस्ट में वायुमंडल की संरचना को भी समझेंगें.

वायुमंडल के मुख्य संघटक तत्व गैस, धूलकण और जलवाष्प है. अर्थात Atmosphere गैस, धूलकण और जलवाष्प से मिलकर बना है. वायुमंडल की उत्पत्ति पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही Hydrogen एवं Helium जैसे गैसों के उत्सर्जन के साथ ही प्रारम्भ हो गया | इससे निर्मित वायुमंडल को प्राथमिक वायुमंडल कहते है |

पुनः पृथ्वी की भूगर्भिक क्रियाओं जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, महाद्वीपीय विस्थापन, प्लेट विवर्तनिकी आदि से विभिन्न गैसों और धुलकणों का प्रवेश हुआ | hydrogen एवं oxygen के संयोग से जल की उत्पत्ति और जलवाष्प के निर्माण के साथ वायुमंडल में आर्द्रता (humidity) का प्रवेश हुआ |

विभिन्न जीव-जन्तु और वनस्पतियों के विकास के साथ ही श्वसन क्रिया, प्रकासशंश्लेषण क्रिया एवं अन्य जैविक क्रियाओं के कारण भी वायुमंडल के संघटक तत्वों का विकास हुआ | इस प्रक्रिया से ही वर्तमान वायुमंडल की उत्पत्ति हुई जो जैविक वातावरण के लिए अनुकूल है |

वायुमंडल की संरचना

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प्रमुख संघटक तत्व- गैस, धूलकण और जलवाष्प

गैस


गैसों की आनुपातिक स्थिति के आधार पर वायुमंडल को दो भागों में विभाजित किया जाता है. सममंडल और विषममंडल.

  1. सममंडल
    • इसकी उंचाई लगभग 80 किलोमीटर तक है.
    • इसमें गैसों का अनुपात लगभग एक समान बना रहता है.
  2. विषममंडल
    • 80 किलोमीटर से ऊपर विषममंडल स्थित है. यानी की कहा जा सकता है की सममंडल के ऊपर विषममंडल स्थित है.
    • विषम मंडल में गैसों के अनुपात में परिवर्तन हो जाता है.
    • यहाँ गैसों में सर्वाधिक nitrogen 78 % के अलावे oxygen 20.9 % और argon 0.9 % मिलता है.
    • इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में Carbon dioxide, Nitrogen, oxygen जैसी भारी गैसे निचली वायुमंडल में और hydrogen, helium जैसी हल्की गैसें ऊपरी वायुमंडल में पाई जाती है.
    • वायुमंडलीय भार का लगभग 97 % भार निचली वायुमंडल में पाई जाती है.
    • यहाँ गैस आणविक एवं परमाण्विक अवस्था में पाई जाती है.

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धूलकण


धूलकण के स्त्रोत पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के पिंड है | इन्हें क्रमशः पार्थिव धूलकण ब्रह्माण्डीय धूलकण कहते है | पार्थिव धूलकण औसत 12 किलोमीटर तक अधिक पाया जाता है | ऊपरी वायुमंडल में ब्रह्माण्डय धूलकण की उपलब्धता है |

धूलकण संघनन के लिए आर्द्रता ग्राही नाभिक का कार्य करता है | यानी की धूलकण के ऊपर ही जलवाष्प के संघनित होने से बादलों का निर्माण होता है | यह क्रिया सर्वाधिक 5 किलोमीटर की ऊँचाई तक होती है | अतः इन्हीं क्षेत्रों में वर्षा वाले बादल विकसित होते है जो पृथ्वी पर जल चक्र का प्रमुख आधार है |

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जलवाष्प

जलवाष्प का एकमात्र स्त्रोत पृथ्वी का जलीय भाग है | इसकी उपलब्धता भी औसत 12 किलोमीटर तक होती है लेकिन 5 किलोमीटर तक इसकी उपलब्धता सर्वाधिक मात्रा में होती है | जलवाष्प वायुमंडलीय आर्द्रता है | इसमें संघनन से बादलों का निर्माण होता है जिससे पृथ्वी पर जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है |

इस तरह स्पष्ट है की वायुमंडल के संघटक तत्वों की विशिष्ट भौतिक दशा और उपलब्धता न केवल वायुमंडल की भौतिक दशा को निर्धारित करता है बल्कि पृथ्वी पर जैवीय दशाओं एवं अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में आधारभूत महत्व रखता है.

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संघटक तत्व के महत्व


वायुमंडल के संघटक तत्वों का पृथ्वी पर जीवन के लिए विशिष्ट महत्व है. Carbon dioxide, Nitrogen, oxygen आदि पारिस्थितिक तंत्र में भुजैव रासयनिक चक्र के लिए महत्वपूर्ण है. भुजैव रासयनिक चक्र का सम्पन्न होना जीवन के लिए अति आवश्यक है.

Carbon dioxide का महत्व

  • वायुमंडल में CO2 मात्र 0.003 % है लेकिन यह प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है. इसके कारण पृथ्वी की औसत ताप संतुलन बना रहता है.
  • वायुमंडल सूर्य से उत्सर्जित लघु तरंग के रूप में ऊर्जा तरंग के लिए लगभग पारदर्शक माध्यम का कार्य करता है और वायुमंडल में प्रवेश करने वाली सौर ऊर्जा का अधिकांस भाग पृथ्वी को प्राप्त हो जाता है.
  • पृथ्वी द्वारा सौर ऊर्जा का अवशोषण और उत्सर्जन किया जाता है. उत्सर्जित सौर ऊर्जा दीर्घ तरंग के रूप में होती है जिसे पार्थिव विकिरण कहा जाता है | इस पार्थिव विकिरण के लिए ग्रीन हाउस गैस अवरोधक का काम करती है |
  • ग्रीन हाउस गैसों द्वारा ही पार्थिव विकिरण के अवशोषण से वायुमंडल गर्म होती है और पृथ्वी पर तापमान की प्राप्ति होती है |

green house effect

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ओजोन का महत्व

ओजोन अत्यंत अल्प मात्रा में 0.001% पाई जाती है. लेकिन सूर्य से उत्सर्जित पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है. ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों के अधिकतम भाग का अवशोषण होता है और सिमित रूप से इसे पृथ्वी पर आने देती है जो विटामिन डी के निर्माण के लिए तथा उपापचय क्रिया के लिए आवश्यक है लेकिन अधिक मात्रा में इसके पहुँचने से चर्म कैंसर, वैश्विक तापन सहित कई दुष्प्रभाव उत्पन्न होंगें. इसी प्रकार अन्य सभी गैसों का भी पृथ्वी पर जीवन के लिए विशिष्ट महत्व है.

इसी तरह ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि गैसों का भी पृथ्वी पर जीवन के लिए व्यापक महत्व है. इसके आलावा धूलकण और जलवाष्प भी विभिन्न जीव-जन्तु और वनस्पतियों के विकास के साथ ही श्वसन क्रिया, प्रकासशंश्लेषण क्रिया एवं अन्य जैविक क्रियाओं के लिए व्यापक महत्व रखता है.

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वायुमंडल की संरचना


वायुमंडल की संरचना हिंदी में. वायुमंडल एक भौतिक संरचना है, जिसमें ऊँचाई के साथ पर्याप्त संरचनात्मक विविधता पाई जाती है, जिसे निर्धारित करने में वायुमंडल के संघटक तत्वों – गैस, धूलकण और जलवाष्प का व्यापक योगदान है.

संरचनात्मक दृष्टिकोण से वायुमंडल को 6 मुख्य परतों तथा 3 संक्रमण परतों में विभाजित किया जाता है. मुख्य परतों का निर्धारण ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन के आधार पर किया जाता है जबकि संक्रमण परतों का निर्धारण तापीय स्थिरता के आधार पर किया जाता है.

इन परतों के बारे में विस्तारपूर्वक पढने से पूर्व आइये वायुमंडल की संरचना का चित्र देखते है.

वायुमंडल की संरचना का चित्र


वायुमंडल की संरचना का चित्र निम्नलिखित है-

वायुमंडल की संरचना का चित्र

 

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वायुमंडल की परतें


वायुमंडल की 6 मुख्य परतें निम्नलिखित है

  1. क्षोभमंडल (Troposphere)
  2. समताप मंडल (Stratosphere)
  3. मध्यमंडल (Mesosphere)
  4. आयनमंडल (Ionosphere)
  5. बहिर्मंडल (External atmosphere)
  6. चुम्बकीय मंडल (Magnetic Atmosphere)

इसके अलावे 3 संक्रमण परतें भी हैं जो निम्नलिखित है

  1. क्षोभसीमा
  2. समताप सीमा
  3. मध्यसीमा

आइये वायुमंडल की संरचना के अंतर्गत एक-एक कर सभी वायुमंडलीय परतों के बारे में विस्तार से समझते है.

1. क्षोभमंडल (Troposphere)

  • पृथ्वी से संलग्न निचली परत को क्षोभमंडल (Troposphere) कहते है.
  • यहाँ विभिन्न वायुमण्डलीय परिघटनाए घटित होती है. इसी कारण इसे विक्षोभमंडल या परिवर्तन मंडल कहते है.
  • यहाँ बादलों का निर्माण चक्रवात, प्रति चक्रवात , पवन प्रवाह जैसी दशाएं विकसित होती है.
  • इसके ऊपरी भाग में तीव्र वेग वाली जेट वायुधारा प्रवाहित होती है.
  • विषुवतीय प्रदेश में अधिक तापमान के कारण वायु की तीव्र संवहन धारा विकसित होने से क्षोभमंडल की ऊँचाई लगभग 18 किलोमीटर तक मिलती है. जबकि ध्रुवों पर कम तापमान के कारण क्षोभमंडल मात्र 8 किलोमीटर तक विस्तृत है.
  • क्षोभमंडल में ऊंचाई के साथ पार्थिव विकिरण के प्रभाव में कमी के कारण तापमान में कमी आती है. इसी कारण क्षोभसीमा के आसपास तापमान -60 से -65 डिग्री सेन्टीग्रेड हो जाता है.
  • क्षोभसीमा 
    • यह एक संक्रमण परत है जो समताप मंडल और क्षोभमंडल के बीच स्थित है.
    • यहाँ पर वायुमण्डलीय परिघटनाए लगभग समाप्त हो जाती है, इसीलिए क्षोभसीमा को मौसमी परिवर्तन का छत (roof) भी कहा जाता है.
    • विभीन्न मौसम एवं ऋतू में क्षोभमंडल की ऊँचाई के साथ क्षोभसीमा के ऊँचाई में भी परिवर्तन होता है.

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2. समताप मंडल (Stratosphere)

  • यह औसत 50 किलोमीटर तक विस्तृत परत है.
  • यहाँ ओजोन की सांद्रता या अनुपात सर्वधिक पाई जाती है.
  • समताप मंडल में 20-35 किलोमीटर के मध्य की परत को ओजोन परत कहा जाता है.
  • ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों के अवशोषण के कारण समताप मंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है. और समताप सीमा पर तापमान ऋणात्मक से बढ़ कर शुन्य (0) तक पहुँच जाता है.
  • समताप मंडल में पृथ्वी से धूलकण और जलवाष्प के पहुँचने से मुक्ताभी मेघ (mother of pearl cloud) का निर्माण होता है.

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3. मध्यमंडल (Mesosphere)

  • इसका विस्तार समताप सीमा के ऊपर लगभग 80 किलोमीटर तक है.
  • यहाँ ओजोन की अनुपस्थिति तथा पार्थिव विकिरण का प्रभाव नहीं होने के कारण ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है.
  • यहाँ मध्यसीमा के पास वायुमंडल का न्यूनतम तापमान -85 से -100 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है.
  • मध्यमण्डल में कभी-कभी ब्रह्माण्ड के धूलकण के साथ जलवाष्प के मिलने से बादलों का निर्माण हो जाता है. इसे निशादीप्त बादल कहते है.

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4. तापमंडल (Thermosphere)

  • मध्यसीमा के ऊपर औसत 500 किलोमीटर की ऊँचाई तक आयनीकृत पदार्थों की स्थितिवाली तापमंडल स्थित है.
  • यहाँ आयनमंडल की स्थिति है, जहाँ से पृथ्वी की रेडियों तरंगें प्रभावित होती है. इसका उपयोग सुचना और संचार के लिए किया जाता है.
    • आयनमंडल का विस्तार 60 से 640 किलोमीटर तक है. इसमें 100 से 300 किलोमीटर के मध्य आयन की संख्या सर्वाधिक पाई जाती है. इसे ऊँचाई की ओर क्रमशः D परत, E परत तथा F परत में विभाजित किया जाता है.
      • D परत – यह लगभग 60 से 100 किलोमीटर तक होती है और केवल दिन में कार्य करता है. इससे रेडियों की दीर्घ तरंगों का परावर्तन होता है.
      • E परत – यह लगभग 90 से 130 किलोमीटर तक होती है और यह भी केवल दिन में ही कार्य करता है. यह भी रेडियों के दीर्घ तरंगों का परावर्तन करती है.
      • F परत – यह लगभग 130 से 300 किलोमीटर तक होती है और यह दिन और रात दोनों में ही कार्य करता है. यह रेडियों के लघु तरंगों का परावर्तन करती है. यह सुचना एवं संचार के लिए सर्वाधिक उपयोगी है.

आयनमंडल

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5. बहिर्मंडल (External atmosphere)

  • आयन मंडल के ऊपर के परतों में आयनीकृत पदार्थो की मात्रा में वृद्धि होती है. इसके कारण तापमान में भी क्रमिक वृद्धि होती है.

6. चुम्बकीय मंडल (Magnetic Atmosphere)

  • इसे पृथ्वी की वायुमंडल की सबसे बाहरी परत माना जाता है.
  • इसमें कॉस्मिक किरणों का सर्वाधिक प्रभाव होता है.
  • यहाँ सौर विद्युत आंधियां चलती रहती है और सौर ज्वाला तथा लपट का प्रभाव होता है.
  • इस क्षेत्र में घटित घटनाओं का प्रभाव क्षोभमंडल की वायुमंडलीय दशाओं पर भी होता है.

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वायुमंडल की संरचना में पर्याप्त जटिलता पाई जाती है. वर्तमान में निचली वायुमंडल और मुख्यतः क्षोभमंडल का ही अध्ययन किया जा सका है, अतः वायुमंडल की संरचना एवं वायुमंडलीय दशाओं को समझने के लिए विशेष वैज्ञानिक अनुसन्धान अपेक्षित है.

इस तरह आपने वायुमंडल की संरचना सहित Atmosphere के बारें में विभिन्न बातों को विस्तार पूर्वक पढ़ा. हमें आशा है की यह आर्टिकल आपके लिए उपयोगी साबित होगा. अगर आपका इससे संबंधित कोई प्रश्न या सुझाव हो तो कमेंट जरुर करें. अगर यह जानकारी आपको अच्छी लगी तो आप इसे शेयर जरुर करें.

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