वायुदाब पेटियों में विचलन तथा प्रभाव

वायुदाब पेटियों की अक्षांसीय स्थिति एक आदर्श दशा है जो इसी रूप में वर्ष भर नहीं पाई जाती है. इसमें महासागरों एवं महाद्वीपों के वितरण और विषमता के कारण तथा पर्वत, पठार, मैदान घाटी जैसी स्थलाकृतिक कारकों के कारण वायुदाब पेटियों में विचलन पाया जाता है. वायुदाब पेटियों में विचलन के व्यापक प्रभाव होते है. इस आर्टिकल में आप इससे संबंधित बातों को पढेंगें.

वायुदाब पेटियों में विचलन तथा प्रभाव

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सागरीय भागों पर समान तल के कारण वायुदाब की दशाएं सामान्यतः एक समान मिलती है. इसी कारण समदाब रेखाएं अपेक्षाकृत सीधी होती है. लेकिन इन्हीं सागरीय क्षेत्रों से सलंग्न महाद्वीपीय भागों पर समदाब रेखाएं अधिक टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है. क्योंकि विभिन्न स्थलाकृतिक कारक वायुदाब को संसोधित कर देता है.

उत्तरी गोलार्ध में जल, स्थल के असमान वितरण और महाद्वीपीय भागों की अधिकता के कारण अक्षांसीय स्तर पर वायुदाब पेटियों में विचलन अधिक पाया जाता है. जबकि दक्षिणी गोलार्ध में जलीय भागों की अधिकता के कारण वायुदाब क्षेत्रों का अक्षांसीय प्रतिरूप अधिक आदर्श रूप में मिलती है. इसी कारण समदाब रेखाएं अक्षांसों के अधिक समानांतर होती है.

सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के साथ तापमान की पेटियों में परिवर्तन एवं क्रमशः उत्तर एवं दक्षिण की ओर स्थानान्तरण के कारण वायुदाब पेटियों की आदर्श दशा में या अक्षांसीय प्रतिरूप में अधिक परिवर्तन हो जाता है. प्रादेशिक स्तर पर वायुदाब क्षेत्रों का विकास होने से विशिष्ट जलवायविक दशाएं भी विकसित हो जाती है.

इसके उदाहरण के तौर पर भूमध्यसागरीय प्रदेश और भारत की मानसून को समझा जा सकता है.

भूमध्यसागरीय प्रदेश पर वायुदाब पेटियों में विचलन का प्रभाव

शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ भूमध्यसागरीय प्रदेश उपोष्ण पछुआ पवनों के प्रभाव में आ जाता है. इस समय उपोष्ण उच्चवायुदाब की पेटियां 30 डिग्री अक्षांस से नीचे स्थानातरित हो जाती है. और उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की दशाएं भूमध्यसागरीय क्षेत्र में विकसित हो जाती है.

ग्रीष्म काल में सूर्य के उत्तरायण के साथ उपोष्ण उच्चवायुदाब की पेटी उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाती है जिससे पछुआ पवनें भी भूमध्यसागरीय प्रदेश से उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाती है. और यह प्रदेश शुष्क व्यापारिक पवनों के प्रभाव में आ जाता है जिससे वर्षा नहीं होती है.

स्पष्टतः भूमध्यसागरीय प्रदेश की जलवायु की उत्पत्ति प्रत्यक्षतः वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण से ही होती है.

भारत की मानसून पर वायुदाब पेटियों में विचलन का प्रभाव

भारत की मानसूनी जलवायु की उत्पत्ति का आधारभूत कारण वायुदाब की स्थिति में उत्क्रमण (उल्टा होना) है. शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन के साथ भारत के ऊपर उच्च वायुदाब के क्षेत्र का विकास होता है. जबकि ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण के साथ उच्च वायुदाब का क्षेत्र समाप्त हो जाता है और निम्न वायुदाब क्षेत्र का विकास होता है.

वायुदाब पेटियों में विचलन

यह स्थिति इस प्रदेश की महाद्वीपों एवं महासागरों की विशिष्ट भौगोलिक दशा के कारण उत्पन्न होती है. इसी के परिणाम स्वरूप शीतकाल में उत्तरी पूर्वी मानसून और ग्रीष्मकाल में दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्त्पत्ति होती है.


स्थानीय स्तर पर भी स्थलाकृतिक एवं उच्चावच कारकों के प्रभाव से वायुदाब का स्थानीय प्रतिरूप विकसित होता है जो स्थानीय मौसमी एवं जलवायविक दशाओं को निर्धारित करती है.

स्पष्टतः पृथ्वी की वायुदाब पेटियां की अक्षांसीय स्थिति एक आदर्श दशा है जो इसी रूप में वर्ष भर नहीं पाई जाती है और वायुदाब पेटियों में विचलन ही विभिन्न वायुमंडलीय घटनाओं को निधारित करता है.

Hey, हम आशा करते है की इस आर्टिकल को पढ़कर आप वायुदाब पेटियों में विचलन तथा प्रभाव को समझ पाए होंगें. इसे समझने में अगर किसी प्रकार की कठिनाई हो या इससे संबंधित आपका कोई प्रश्न या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करें अन्यथा कांटेक्ट अस के माध्यम से सम्पर्क करें. अगर आपको इस आर्टिकल की जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरुर करें. धन्यवाद.

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