प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी का आलोचनात्मक परीक्षण

प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी (प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत) के द्वारा लगभग सभी भूगर्भिक क्रियाएं (Geologic activity) जैसे की भूकम्प, ज्वालामुखी, वलित पर्वतों की उत्पत्ति, सागर नितल प्रसरण, कटक निर्माण तथा ट्रेंच आदि की व्याख्या की जा सकी. तमाम भूगर्भिक क्रियाओं की सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या के बाबजूद इस सिद्धांत में भी कई मौलिक कमियां बनी हुई है और इस आधार पर इसकी आलोचना भी की जाती है. इसी सन्दर्भ में हम यहाँ प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी का आलोचनात्मक परीक्षण करेंगें.

प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी का आलोचनात्मक परीक्षण

प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी का आलोचनात्मक परीक्षण


Critical examine of plate tectonics theory.

1. संवहनिक तापीय ऊर्जा तरंग का स्पष्ट ज्ञान नही

  • यह सिद्धांत मूलतः प्लेटों की गतिशीलता पर आधारित है, जिसका कारण प्लास्टिक दुर्बलमंडल से उत्पन्न होने वाली संवहनिक तापीय ऊर्जा तरंगों को माना जाता है. भूभौतिकी एवं सिस्मोग्राफ के अध्ययन से प्लास्टिक दुर्बलमंडल की अर्धतरलता को स्वीकार किया गया, जिसका कारण गहराई के साथ तापमान में वृद्धि होना माना जाता है. ऐसे में तापीय ऊर्जा तरंगों की उत्पत्ति सैद्धांतिक रूप से सही प्रतीत होती है.
  • लेकिन ऊर्जा तरंगों की उत्पत्ति, सक्रियता और इससे परिवर्तनशीलता के कारणों की स्पष्ट व्याख्या नहीं हो पाती. तापीय ऊर्जा तरंगों को मापने की कोई यांत्रिक विधि का विकास नहीं हो पाया है. ऐसे में ऊर्जा तरंगों के संवहनिक व्यवस्था का सिद्धांत, तर्क और अनुमान पर ही आधारित है. जबकि इसकी स्पष्ट मापन किया जाना चाहिए. ऐसे में इस सिद्धांत का मुख्य आधार ही कमजोर हो जाता है.

2. प्लेटों की गतिशीलता संबंधी विरोधी स्थिति

  • प्लेटों की गतिशीलता संबंधी विरोधी स्थिति की व्याख्या भी नहीं हो पाती. उदाहरण के लिए एक ही प्लेट के विभिन्न सीमांत विभिन्न दिशा में गतिशील है. इसकी व्याख्या संवहनिक तापीय ऊर्जा तरंग की वर्तमान अवधारणा से नहीं हो पाती है.
  • भारतीय प्लेट में उत्तर एवं उत्तर पूर्व की दिशा में गति पाई जाती है. इसकी व्याख्या ऊर्जा तरंगों से नहीं हो पाती है.
  • प्रशांत प्लेट पूर्व से पश्चिम दोनों सीमान्तो की ओर गतिशील है. यदि ऐसी स्थिति है तब प्रशांत प्लेट में विखंडन होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है. अटलांटिक महासागर में अपसारी उर्जा तरंगों द्वारा विखंडन, कटक निर्माण और सागर नितल प्रसरण की व्याख्या हो जाती है लेकिन प्रशांत प्लेट में विपरीत गति की व्याख्या नहीं हो पाती.

3. छोटे प्लेटों की गति 

  • इस सिद्धांत की एक प्रमुख समस्या बड़े प्लेट के अंतर्गत स्थित छोटे प्लेटों में विरोधी गति का पाया जाना भी है. विभिन्न प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है की बड़े प्लेट के अंतर्गत स्थित छोटे प्लेटों में बड़े प्लेट की दिशा से भिन्न दिशा में गति पाई जाती है.
  • यदि संवहनिक ऊर्जा तरंगे बड़े प्लेटों की गतिशीलता का कारण है तब आंतरिक भागों में स्थित छोटे प्लेटों की विरोधी गति किस कारण से उत्पन्न हुई है. इसकी व्याख्या नही हो पाती है.

4. निर्माणकारी-विनाशकारी क्रिया में समन्वय नहीं

  • इस सिद्धांत द्वारा महासागरों के मध्यवर्ती कटक की उत्पत्ति की व्याख्या अपसारी गति के आधार पर की जाती है और यह माना जाता है की जिस अनुपात में निर्माणकारी क्रिया घटित होती है उसी अनुपात में अभिसारी सीमांतों के सहारे विनाशकारी क्रिया भी घटित होती है. लेकिन व्यावहारिक रूप से निर्माणकारी एवं विनाशकारी सीमांतों में एकरूपता नही पाई जाती है.
  • इसके अतिरिक्त कटक प्रसार के क्षेत्र की तुलना में प्रत्यावर्तन के क्षेत्र कम है. कटक प्रसार अटलांटिक महासागर में अधिक हो रहा है लेकिन प्रत्यावर्तन के क्षेत्र प्रशांत महासागर में अधिक पाए जाते है. इस विरोधी स्थिति की स्पष्ट व्याख्या नहीं हो पाती है.

5. प्लेटों की संख्या का सही आकंलन न होना

इन कमियों के अतिरिक्त प्लेटों की पहचान और प्लेटों की संख्या का निर्धारण भी चुनौती है. प्लेटों की पहचान तभी हो पाती है जब किसी क्षेत्र में भूगर्भिक हलचले घटित होती है. इसी कारण प्लेटों की संख्या को लेकर मतभेद बने रहे है.

6. ड्रेकेन्सबर्ग भी एक नवीन वलित पर्वत है जिसकी स्थिति प्लेटों के अभिसारी सीमांत पर नहीं है अतः इसकी उत्पत्ति की व्याख्या नहीं हो पाती. हालाँकि यह एक कम ऊंचा, कम विस्तृत वलित पर्वत है जिसकी उत्पत्ति संपीडन की सामान्य प्रक्रिया से भी संभव है.

7. मध्यपिंड की व्याख्या न कर सकना

  • यह सिद्धांत दो वलित पर्वतों के मध्य वलन से अप्रभावित क्षेत्र (मध्य पिंड ) की व्याख्या नहीं कर पाता. जैसे यूरेशियन प्लेट में वलन से कुनलून एवं हिमालय की उत्पत्ति हुई. जिसके मध्य में तब्बत का पठार एक मध्य पिंड है.
  • इसी प्रकार आल्पस एवं एटलस वलित पर्वत के मध्य भूमध्य सागर भी एक मध्यपिंड है जिसकी व्याख्या नहीं हो पाती है.
  • भूमध्यसागर में ज्वालामुखी और भूकम्प मध्यपिंड के सहारे ही उत्पन्न होते है, जो प्लेट विवर्तनिकी द्वारा स्पष्ट नहीं हो पाता.

स्पष्ट है की प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी में भी कई मौलिक समस्याएँ और वैज्ञानिक कमियां बनी हुई है. अतः इस सिद्धांत को भी पुर्णतः त्रुटिहीन नहीं कहा जा सकता. हालाँकि इसके वावजूद अधिकांस भूगर्भिक क्रियाओं की व्याख्या इस सिद्धांत के आधार पर ही की जाती है. लेकिन इस दिशा में विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता है.

Hey, I hope यह जानकारी आपको अच्छी लगी होगी और इस पोस्ट को पढने के बाद प्लेट टेक्टानिक्स थ्योरी की सीमाओं को समझ पाए होंगें. अगर इसे समझने में किसी तरह की कठिनाई हो रही हो तो कमेंट करें अन्यथा कांटेक्ट अस के माध्यम से सम्पर्क करें. प्लेट टेक्टोनिक्स थ्योरी के बारे में और अधिक जानकारी के लिए ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत और ‘प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत द्वारा भूगर्भिक क्रिया की व्याख्या‘ पोस्ट को पढ़ें. धन्यवाद.

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