संवहनिक ऊर्जा तरंग, पूराचुम्बकत्व, प्लेट विवर्तनिकी और सागर नितल प्रसरण जैसे नवीन सिद्धांत ने कैसे महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की पुष्टि की

वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत में माना गया की महाद्वीपों एवं महासागरों के वर्तमान स्थिति का निर्धारण महाद्वीपों के विखंडन एवं विस्थापन के द्वारा हुई है. लेकिन इस संबंध में वेगनर द्वारा अपनाये गये महाद्वीपों के विखंडन एवं विस्थापन के कारणों से संबंधित व्याख्या अवैज्ञानिक था. इसके बाबजूद इस सिद्धांत ने यह प्रमाणित कर दिया की महाद्वीपों का विस्थापन हुआ है. बाद में आने वाले नवीन सिद्धांत जैसे होम्स का संवहनिक ऊर्जा तरंग, पूराचुम्बकत्व, प्लेट विवर्तनिकी और सागर नितल प्रसरण सिद्धांत ने भी इसकी पुष्टि की.

सागर नितल प्रसरण सिद्धांत

इसी संदर्भ में कहा जा सकता है की महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद आने वाले नवीन सिद्धांत जैसे की संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत, पूराचुम्बकत्व सिद्धांत, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत और सागर नितल प्रसरण सिद्धांत ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की पुष्टि की.

महाद्वीपीय विस्थापन और नवीन कार्यो में संबंध


वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद इस तथ्य को मान्यता मिली की विश्व के वर्तमान महाद्वीपों का निर्माण एक प्राचीनतम महाद्वीप पेंजिया के क्रमिक विखंडन और विस्थापित होने से हुआ है. इसके बाद भूगर्भिक क्रियाओं की व्याख्या इसी के आधार पर किया जाने लगा. इसी संदर्भ में कई नवीन मौलिक कार्य किये गये और संबंधित सिद्धांतों का विकास हुआ.

नवीन कार्यों में होम्स का संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत, पूराचुम्बकत्व का सिद्धांत और सागर नितल प्रसरण सिद्धांत मुख्य है. इन सिद्धांतो में अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक आधारों पर न केवल महाद्वीपीय विस्थापन की पुष्टि की गई बल्कि महाद्वीपीय विस्थापन से संबंधित वैज्ञानिक कमियों को दूर करने का प्रयास भी किया गया. इन्हीं आधारों पर विकसित प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में प्लेटों की गतिशीलता के संदर्भ में महाद्वीपीय विस्थापन की व्याख्या की गई.

ऐसे में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को नवीन कार्यों में भी सैद्धांतिक स्वीकृति मिली, साथ ही पेंजिया के क्रमिक विखंडन, विस्थापन की दिशा और विस्थापन के कारणों की वैज्ञानिक व्याख्या की जा सकी.

होम्स का संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत


संवहन तरंग सिद्धांत और महाद्वीपीय विस्थापन में अंतर्संबंध.

होम्स ने 1928 में वलित पर्वतों की व्याख्या के क्रम में संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत दिया. इससे महाद्वीपीय विस्थापन की भी पुष्टि हुई. होम्स ने न केवल महाद्वीपों के विस्थापन को स्वीकार किया बल्कि महाद्वीपों के विखंडन और विस्थापन के लिए उत्तरदायी अंतर्जात बलों की व्याख्या भी की.

होम्स का संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत

 

होम्स के संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत के अनुसार औसत 100 km मोती परत ठोस भूपटल के नीचे अधःस्तर का उपरी भाग तरल अवस्था में है, यहाँ से तापीय ऊर्जा तरंगों की उत्पत्ति होती है. ये तापीय ऊर्जा तरंगें लंवबत एवं क्षैतिज रूप से प्रवाहित होती है. क्षैतिज तरंगें अपसारी एवं अभिसारी प्रकार की होती है. इनसे भूपटल में क्रमशः तनाव एवं संपीडन बल उत्पन्न होता है. यह विखंडन एवं वलन का कारण है. यह प्रक्रिया ही प्राचीनतम महाद्वीप के क्रमिक विखंडन, महाद्वीपों के विस्थापन और महाद्वीपों में संपीडन का कारण है.

अपसारी ऊर्जा तरंगों के कारण ही पेंजिया उत्तर में अन्गारालैंड और दक्षिण में गोंडवानालैंड में विभक्त हो गया और इसके मध्य में टेथिस सागर की उत्पत्ति हुई. पुनः इन महाद्वीपों के मध्य से ऊर्जा तरंगों की उत्पप्ति हुई. इसके कारण अंगारालैंड और गोंडवानालैंड में क्रमिक विखंडन तथा विस्थापन जारी रहा. इससे वर्त्तमान महाद्वीपों की स्थिति का निर्धारण हुआ.

अपसारी ऊर्जा तरंगे ही विखंडित महाद्वीपों में विस्थापन के लिए उत्तरदायी है. होम्स के सिद्धांत द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को वैज्ञानिक भूगर्भिक आधार प्राप्त हुआ, इससे महाद्वीपीय विस्थापन की व्याख्या अधिक वैज्ञानिक आधारों पर की जाने लगी.

पूरा चुम्बकत्व सिद्धात या भू-चुम्बकत्व सिद्धांत


पृथ्वी की भूगर्भिक संरचना एवं भूगर्भिक क्रियाओं के कारण पृथ्वी में चुम्बकत्व का गुण उत्पन्न होता है. इसे भू चुम्बकत्व कहते है. विभिन्न भुग्भिक कालों में पृथ्वी की भूचुम्बकत्व का अध्ययन पूरा चुम्बकत्व कहलाता है. पूराचुम्बकत्व के अध्ययन से महाद्वीपीय विस्थापन की भी पुष्टि हुई. साथ ही यह तथ्य भी स्थापित हुआ की महासागरों के नितल में भी विखंडन, विस्थापन और सक्रियता पाई जाती है. यह सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का भी प्रमुख आधार बना.

पूरा चुम्बकत्व सिद्धात या भू-चुम्बकत्व सिद्धांत

पृथ्वी की भूगर्भ में बाह्य कोर तरल अवस्था में है. यहाँ स्थित तरल निकेल एवं फेरस में पृथ्वी की घूर्णन के कारण गति उत्पन्न होती है. जिससे विद्युत चुम्बकीय तरंग की उत्पत्ति होती है.इन तरंगों के कारण पृथ्वी पर विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है. इसके कारण ही पृथ्वी में चुम्बकीय गुण विकसित हो जाता है. इसे ही भू चुम्बकत्व कहते है.

पृथ्वी की चुम्बकीय अक्ष भौगोलिक अक्ष के साथ 23/2 अंश के कोण पर स्थित है. स्पष्टतः पृथ्वी के दो अक्ष भौगोलिक अक्ष और चुम्बकीय अक्ष तथा इसी अनुरूप भगौलिक एवं चुम्बकीय ध्रुव पाए जाते है. पृथ्वी की दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव, भौगोलिक उत्तर की ओर तथा उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव, भौगोलिक दक्षिण की ओर है.

पूराचुम्बकत्व के अध्ययन से यह ज्ञात होता है की पृथ्वी की भौगोलिक एवं चुम्बकीय ध्रुव तथा अक्ष परिवर्तित होते रहे है. यह तभी संभव है जब महाद्वीपों में विस्थापन होता रहा हो. यदि चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन स्वतः होता, तब चुम्बकीय परिभ्रमण वक्र की दिशा एक ही युग में विभिन्न महाद्वीपों पर एकसमान पाई जाती. जबकि ऐसा ज्ञात नहीं होता.

समान युग में विभिन्न महाद्वीपों पर चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन की दिशा भिन्न-भिन्न पायी गई. अर्थात चुम्बकीय परिभ्रमण वक्र की दिशा में भिन्नता पायी जाती है. यह तभी संभव है जब महाद्वीप विभिन्न दिशाओं में विस्थापित होते रहे. स्पष्टतः पूराचुम्बकत्व के अध्ययन से मह्द्विपीय विस्थापन सिद्धांत की पुष्टि हुयी.

मैशन का कार्य


पूराचुम्बकत्व संबंधी कार्यों को मैशन ने समानांतर चुम्बकीय पट्टियों की संकल्पना एवं चुम्बकीय विसंगति सिद्धांत के आधार पर आगे बढाया.

मैशन का कार्य 

चुम्बकीय विसंगति सिद्धांत

चुम्बकीय विसंगति सिद्धांत में मैशन ने माना की पृथ्वी की 50% या लगभग आधी चट्टानों की चुम्बकीय दशा एकसमान और शेष की विपरीत है.

समानांतर चुम्बकीय पट्टियों की संकल्पना

मैशन ने प्रशांत महासागर में नितल की चट्टानों के अध्ययन के क्रम में यह पाया की बैसाल्ट की चट्टानें समानांतर पट्टियों में पायी जाती है. जिनकी आयु और चुम्बकत्व में भिन्नता मिलती है. इससे सागर नितल की सक्रियता की जानकारी प्राप्त हुई. साथ ही यह तथ्य स्पष्ट हुआ की सागर नितल निर्माण की प्रक्रिया में है. इस आधार पर ही हेरिहेस ने 1960 में सागर नितल प्रसरण सिद्धांत दिया.

हेरीहेस का सागर नितल प्रसरण सिद्धांत


हेरीहेस ने 1960 में सागर नितल प्रसरण का सिद्धांत दिया. यह अटलांटिक महासागर के मध्यवर्ती कटक के अध्ययन पर आधारित था. हेरीहेस के सागर नितल प्रसरण सिद्धांत अनुसार मध्यवर्ती कटक संवहनिक ऊर्जा तरंगों के अपसरण के क्षेत्र में स्थित है.

प्लास्टिक दुर्बलमंडल से उत्पन्न ऊर्जा तरंगें स्थलमंडल के अवरोध के कारण विपरीत दिशा में विस्थापित होती है. फलस्वरूप स्थलमंडल में विखंडन की क्रिया घटित होती है. इससे उत्पन्न दरार के सहारे भूगर्भ का मैग्मा सतह पर आता है. जिससे बैसाल्ट की नवीन भूपटल का निर्माण होता है .

उपरोक्त क्रिया के पुनः घटित होने से बैसाल्ट की सतह में विखंडन एवं विस्थापन की क्रिया होती है तथा मध्य में नवीन मैग्मा का जमाव हो जाता है. इस प्रक्रिया के निरंतर घटित होने से प्राचीन बैसाल्ट की सतह का निरंतर विखंडन और विस्थापन होता रहता है. इस प्रक्रिया को सागर नितल प्रसरण कहते है.

हेरीहेस का सागर नितल प्रसरण सिद्धांत

मध्य अटलांटिक कटक के दोनों ओर सागर नितल की चट्टानों में वर्तमान में भी प्रसरण जारी है. कटक के क्षेत्र में सक्रीय ज्वालामुखी की स्थिति, भ्रंस की स्थिति विखंडन की प्रक्रिया की पुष्टि करते है. यह क्षेत्र प्रमुख भूकम्प क्षेत्र भी है. इसके अतिरिक्त कटक के दोनों ओर बैसाल्ट की चट्टानें समानांतर पट्टियों में पाए जाते है, जिनकी आयु और चुम्बकत्व में भिन्नता पाई जाती है.

हेरीहेस का सागर नितल प्रसरण सिद्धांत

सागर नितल प्रसरण सिद्धांत को वाइन एवं मैथिल्स (1963) के चुम्बकीय उत्क्रमण सिद्धांत ने वैज्ञानिक रूप से और अधिक प्रमाणित कर दिया. इसके अनुसार कटक के दोनों ओर की पट्टियाँ न केवल विभिन्न चुम्बकीय गुणों वाली होती है बल्कि इनकी चुम्बकीय दिशा में एकान्तर क्रम पाया जाता है. इसे समानांतर एकान्तर चुम्बकीय पट्टियों की संकल्पना भी कहते है.

समानांतर एकान्तर चुम्बकीय पट्टियों की संकल्पना

पृथ्वी की चट्टानों की चुम्बकीय दिशा में एकान्तर क्रम का पाया जाना पृथ्वी के चुम्बकीय उत्क्रमण से संबंधित है. पृथ्वी की मूल चुम्बकीय दिशा में समय विशेष में उत्क्रमण होता रहता है. जब पृथ्वी पर मैग्मा का उदगार होता है और नवीन वैसाल्ट की सतह का निर्माण होता है तब इसमें चुम्बकत्व का गुण विकसित हो जाता है. इस समय चट्टानों की चुम्बकीय दिशा वही होती है जो उस समय पर पृथ्वी की होती है.

एक समय के बाद जब पृथ्वी की मूल चुम्बकीय दिशा में उत्क्रमण होता है तब इस समय निर्मित बैसाल्ट चट्टानों की चुम्बकीय दिशा पूर्व के बैसाल्ट चट्टानों से विपरीत हो जाता है. इसी कारण कटक के क्षेत्र में जहाँ मैग्मा के उदगार के कारण नवीन बैसाल्ट का निर्माण होता रहता है, वहां दोनों ओर की चट्टानें समानांतर  एकान्तर चुम्बकीय पट्टियों के रूप में पाई जाती है.

इस तरह पूराचुम्बकत्व, हेरीहेस का सागर नितल प्रसरण सिद्धांत, वाइन एवं मैथ्यूज के कार्यों से यह तथ्य स्थापित हुआ की न केवल महाद्वीपों में विस्थापन पायी जाती है बल्कि सागर नितल में भी विखंडन एवं विस्थापन की प्रक्रिया घटित होती है. इसी आधार पर 1960 के दशक में प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत का विकास हुआ. प्लेट विवर्तनिक के बारे में जानकारी के लिए आप यह पोस्ट पढ़ सकते है- 1. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत 2. प्लेट विवर्तनिकी और भूगर्भिक क्रिया 3. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की कमियां.


Hey, I hope आप इस पोस्ट को पढ़कर आप समझ पाए होंगें की किस तरह महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद आने वाले नवीन सिद्धांत जैसे की संवहनिक ऊर्जा तरंग सिद्धांत, पूराचुम्बकत्व सिद्धांत, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत और सागर नितल प्रसरण सिद्धांत ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की पुष्टि की. अगर इसे समझने में किसी तरह की कठिनाई आ रही हो तो कमेंट करें अन्यथा कांटेक्ट अस के माध्यम से सम्पर्क करें. हमारी पोस्ट पढने के लिए बहुत धन्यवाद.

 

2 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *