पृथ्वी की भू आकृतियां

पृथ्वी की भूपर्पटी (The crust) पर दिखाई देने वाली भौतिक आकृतियों को भू आकृतियां (Landforms) कहा जाता है. इन भू आकृतियों का निर्धारण पृथ्वी की भूगर्भिक शक्तियों और बाह्य शक्तियों के अंतर्क्रिया से होती है, इन्हें अंतर्जात बल (Endogenic force) एवं बहिर्जात बल (Exogenic force) कहते है. ये पृथ्वी पर भौतिक विषमता (उच्चावच विषमता) को उत्पन्न करते है, इससे ही पृथ्वी की भौतिक भूदृश्य (Landscape) का निर्धारण होता है. [यह भी पढ़ें- सूर्यातप]

पृथ्वी की भू आकृतियां

पृथ्वी की भू आकृतियां के प्रकार


Types of Earth’s Landforms.

उत्पत्ति की प्रक्रिया के आधार पर पृथ्वी की भू आकृतियां को तीन वर्ग (types) में विभाजित किया जा सकता है.

  1. प्रथम श्रेणी की भू-आकृति (First Types landforms) ex- महाद्वीप
  2. द्वितीय श्रेणी की भू-आकृति (Secondary types landforms) ex- वलित पर्वत
  3. तृतीय श्रेणी की भू-आकृति (Tertiary Types landforms) ex- नदी घाटी       [यह भी पढ़ें- पवनों के प्रकार]

प्रथम श्रेणी की भू-आकृति


प्रथम श्रेणी की भू-आकृति के अंतर्गत पृथ्वी की प्राथमिक भौतिक आकृतियों को रखा जाता है. जैसे की महाद्वीप एवं महासागर का नितल. इनकी उत्पत्ति पृथ्वी की भूगर्भिक क्रियाओं (Geologic activity) एवं अंतर्जात बल (Endogenic force) के द्वारा हुई है. [यह भी पढ़ें-वाताग्र]

द्वितीय श्रेणी की भू-आकृति


प्रथम प्रकार की भू-आकृति के उपर अंतर्जात बल एवं भूगर्भिक क्रियाओं का प्रभाव बने रहने के कारण भूपटल पर नवीन भौतिक आकृतियों का निर्माण होता है, इन्हें द्वितीय श्रेणी की भू-आकृति कहा जाता है.

इनमें वलन, भ्रन्सन, ज्वालामुखी क्रिया, भूकम्प क्रिया तथा उत्थान, धंसान जैसी भूगर्भिक क्रियाओं द्वारा उत्पन्न भौतिक आकृतियों को रखा जाता है. जैसे की वलित पर्वत (folded mountain) , भ्रसोत्थ पर्वत (block mountain), भ्रंश घाटियाँ (Depleted valleys), ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic mountain) एवं ज्वालामुखी पठार (volcanic plateau) आदि. [यह भी पढ़ें-जेट वायुधारा]

तृतीय श्रेणी की भू-आकृति


अंतर्जात बल द्वारा उत्पन्न भू आकृतियों पर बहिर्जात शक्तियों द्वारा संसोधनकारी प्रभावों के फलस्वरूप तृतीय श्रेणी की भू आकृतियों का निर्माण होता है.

प्रथम और द्वितीय प्रकार की भू आकृतियों में पृथ्वी के बाह्य क्षेत्रों से, मुख्य रूप से जलवायविक तत्वों के प्रभाव से, संसोधन एवं रूपांतरण की क्रिया घटित होती है. इससे उनमें विखंडन और विघटन (कांट-छांट) का कार्य होता है. इससे नवीन भू-आकृतियों का विकास होता है. इन्हें तृतीय प्रकार की भू आकृति कहते है.

इसके अंतर्गत तापमान, वायुदाब, आर्द्रता तथा गतिशील कारकों जैसे नदी, पवन, हिमानी, भूमिगत नदी तथा समुद्री तरंगों के प्रभाव से उत्पन्न भौतक आकृतियों को रखा जाता है. जैसे नदी-घाटी, बाढ़ का मैदान, डेल्टा, हिमालय निर्मित घाटियाँ आदि. [यह भी पढ़ें-प्लेट विवर्तनिकी]

भू आकृतिक प्रक्रम


Geomorphic Processes.

उत्पत्ति की प्रक्रिया के आधार पर पृथ्वी की भू आकृतियां के प्रकार को समझने के बाद कहा जा सकता है की पृथ्वी की भू आकृतियां अंतर्जात एवं बहिर्जात बल दोनों से निर्धारित होती है. वास्तव में, कोई भी भौतिक आकृति विशुद्ध रूप से किसी एकाकी शक्ति का परिणाम नहीं होता बल्कि अंतर्जात और बहिर्जात बल की सम्मिलित प्रक्रिया एवं अंतर्क्रिया से निर्धारित होती है. इस प्रक्रिया को भू आकृति प्रक्रम या भू-आकृतिक प्रक्रियाएं (Geomorphic Processes) कहते है.

अंतर्जात बल के प्रभावों के उत्पन्न होने के साथ ही बहिर्जात बल भी प्रभावी हो जाते है और दोनों क्रियाएँ साथ-साथ घटित होती है. इससे भौतिक आकृतियों का निर्धारण होता है. हालाँकि किसी भी भूआकृति पर किसी विशिष्ट कारक या बल का अधिक प्रभाव हो सकता है. और उत्पत्ति की प्रक्रिया में कोई एक कारक के प्रत्यक्ष योगदान के आधार पर इन्हें तीन वर्गो में विभाजित किया जाता है. जिसकी चर्चा हम उपर कर चुके है. [यह भी पढ़ें-भूगर्भिक क्रिया]

विविध स्थलाकृतियों का निर्माण अंतर्जात और बहिर्जात बल की सम्मिलित क्रिया के परिणामस्वरूप होती है.

अंतर्जात बल की उत्पत्ति मुख्यतः प्लास्टीक दुर्बलमंडल (asthenosphare) से होती है. दुर्बलमंडल अर्द्धतरल अवस्था में स्थित एक परत है. इसकी अर्द्धतरलता का कारण तापमान में वृद्धि के कारण पदार्थों का गलनांक (melting point) प्राप्त कर लेना है. सतह से गहराई की ओर दबाब में वृद्धि और भूगर्भ में स्थित रेडियों सक्रीय तत्वों के विखंडन के कारण 1 अंश प्रति 32 मीटर के दर से तापमान में वृद्धि होती है. इसके कारण प्लास्टिक अवस्था में परत की उत्पत्ति होती है. यहाँ से संवहनिक तापीय ऊर्जा तरंगों की उत्पत्ति होती है. इसके कारण ही स्थलमंडल में वलन भ्रन्सन, ज्वालामुखी, भूकम्प, उत्थान, धंसान आदि क्रियाएँ घटित होती है, जिससे प्रथम एवं द्वितीय प्रकार की भू-आकृति का निर्माण होता है.

इन भू आकृतियों के के उपर बहिर्जात बलों के प्रभाव से नवीन भू-आकृतियों का निर्धारण होता है. उदाहरण के लिए हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है. इसकी उत्पत्ति अंतर्जात बलों के प्रभाव से हुई है, लेकिन हिमालय में उत्थान के साथ ही यहाँ बाह्य कारकों एवं विशेषकर नदियों द्वारा कांट-छांट की क्रिया प्रारम्भ हो गयी. इससे नदी निर्मित गहरी घाटियाँ गार्ज एवं कैनियन का निर्माण हुआ. वर्तमान में भी हिमालय में उत्थान की क्रिया जारी है और इसी अनुरूप नदियों द्वारा अपरदन की क्रिया भी अधिक प्रभावी तरीके से घटित हो रही है. इससे घाटियों की गहराई में वृद्धि हो रही है. इस तरह कहा जा सकता है की हिमालय अंतर्जात बलों के प्रभाव से निर्मित द्वितीय प्रकार की स्थलाकृति है. लेकिन हिमालय की भौतिक संरचना का निर्धारण तृतीय प्रकार की भू-आकृतियों से भी होता है, जिसका मुख्य कारण बहिर्जात बल और मुख्यतः नदियाँ है.

स्पष्ट है की  विविध स्थलाकृतियों का निर्माण भी अंतर्जात और बहिर्जात बल की सम्मिलित क्रिया के परिणामस्वरूप होती है.

Hey, I hope आप इस पोस्ट को पढने के बाद पृथ्वी की भू आकृतियां कैसे बनती है, के बारे में समझ पाए होंगें. अगर आपको इसे समझने में किसी तरह की कठिनाई हो तो नीचे कमेंट करें अन्यथा कांटेक्ट अस के माध्यम से सम्पर्क करें. हमारा ब्लॉग पढने के लिए आपका बहुत धन्यवाद. [यह भी पढ़ें- भू आकृति भूगोल से संबंधित पोस्ट  और जलवायु भूगोल से संबंधित पोस्ट ]

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